उत्तरकाण्ड · चौपाई · चौपाई
नर सरीर धरि जे पर पीरा। करहिं ते सहहिं महा भव भीरा।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दमनुष्यका शरीर धारण करके जो लोग दूसरोंको दु:ख पहुँचाते हैं, उनको जन्म-मृत्युके महान् संकट सहने पड़ते हैं। मनुष्य मोहवश स्वार्थपरायण होकर अनेकों पाप करते हैं, इसीसे उनका परलोक नष्ट हुआ रहता है॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 948 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
नर सरीर धरि जे पर पीरा। करहिं ते सहहिं महा भव भीरा।।
करहिं मोह बस नर अघ नाना। स्वारथ रत परलोक नसाना।।
स्रोत अभिलेख 7.41 · पुस्तक पृ. 948, 949
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 नर सरीर धरि जे पर पीरा। करहिं ते सहहिं महा भव भीरा।।
English explanation
Those who, having taken human form, cause others pain endure the great ordeals of worldly existence.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| नर | मनुष्य का | human |
| सरीर | शरीर | body |
| धरि | धारण करके | having assumed |
| जे | जो लोग | those who |
| पर | दूसरों को | to others |
| पीरा | पीड़ा | pain |
| करहिं | देते हैं | cause |
| ते | वे | they |
| सहहिं | सहते हैं | endure |
| महा | बड़े | great |
| भव | संसार-चक्र के | of worldly existence |
| भीरा | संकट | ordeals |
2 करहिं मोह बस नर अघ नाना। स्वारथ रत परलोक नसाना।।
English explanation
Under delusion’s sway, people commit many sins; absorbed in self-interest, they ruin their prospects in the hereafter.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| करहिं | करते हैं | commit |
| मोह | मोह के | of delusion |
| बस | वश में | under the sway |
| नर | मनुष्य | people |
| अघ | पाप | sins |
| नाना | अनेक प्रकार के | of many kinds |
| स्वारथ | स्वार्थ में | in self-interest |
| रत | लगे हुए | absorbed |
| परलोक | परलोक | the hereafter |
| नसाना | बिगाड़ लेते हैं | ruin |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 7.41
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 948
- सहायक विषय
- हनुमान्जीके द्वारा भरतजीका प्रश्न और श्रीरामजीका उपदेश
- मुद्रित पृष्ठ
- 948, 949
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