उत्तरकाण्ड · चौपाई · चौपाई
देहु भगति रघुपति अति पावनि। त्रिबिध ताप भव दाप नसावनि।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दहे रघुनाथजी! आप हमें अपनी अत्यन्त पवित्र करनेवाली और तीनों प्रकारके तापों और जन्म- मरणके क्लेशोंका नाश करनेवाली भक्ति दीजिये। हे शरणागतोंकी कामना पूर्ण करनेके लिये कामधेनु और कल्पवृक्षरूप प्रभो! प्रसन्न होकर हमें यही वर दीजिये॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 943 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
देहु भगति रघुपति अति पावनि। त्रिबिध ताप भव दाप नसावनि।।
प्रनत काम सुरधेनु कलपतरु। होइ प्रसन्न दीजै प्रभु यह बरु।।
स्रोत अभिलेख 7.35 · पुस्तक पृ. 943, 944
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 देहु भगति रघुपति अति पावनि। त्रिबिध ताप भव दाप नसावनि।।
English explanation
AI-draft meaning: O Lord Rama, grant devotion that deeply purifies and destroys the three kinds of suffering and the burning distress of worldly existence.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| देहु | दीजिए | grant |
| भगति | भक्ति | devotion |
| रघुपति | हे रघुवंश के स्वामी राम | O Rama, lord of Raghu’s lineage |
| अति | अत्यंत | exceedingly |
| पावनि | पवित्र करने वाली | purifying |
| त्रिबिध | तीन प्रकार के | threefold |
| ताप | दुःख-संताप | suffering |
| भव | संसार का | of worldly existence |
| दाप | जलन या संताप | burning distress |
| नसावनि | नष्ट करने वाली | destroying |
2 प्रनत काम सुरधेनु कलपतरु। होइ प्रसन्न दीजै प्रभु यह बरु।।
English explanation
You are like the wish-fulfilling divine cow and celestial tree for those who seek refuge. O Lord, be pleased and grant this boon.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| प्रनत | शरणागतों के | of those seeking refuge |
| काम | मनोरथ | wishes |
| सुरधेनु | इच्छापूर्ति करने वाली दिव्य गाय | the wish-fulfilling divine cow |
| कलपतरु | इच्छापूर्ति करने वाला कल्पवृक्ष | the wish-fulfilling celestial tree |
| होइ | होकर | being |
| प्रसन्न | प्रसन्न | pleased |
| दीजै | दीजिए | please grant |
| प्रभु | हे स्वामी | O Lord |
| यह | यह | this |
| बरु | वरदान | boon |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 7.35
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 943
- सहायक विषय
- पुत्रोत्पत्ति, अयोध्याजीकी रमणीयता, सनकादिका आगमन और संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 943, 944
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।