उत्तरकाण्ड · चौपाई · चौपाई
त्यागहिं कर्म सुभासुभ दायक। भजहिं मोहि सुर नर मुनि नायक।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दइसीसे वे शुभ और अशुभ फल देनेवाले कर्मोंको त्याग कर देवता, मनुष्य और मुनियोंके नायक मुझको भजते हैं। [इस प्रकार] मैंने संतों और असंतोंके गुण कहे। जिन लोगोंने इन गुणोंको समझ रखा है, वे जन्म-मरणके चक्करमें नहीं पड़ते॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 949 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
त्यागहिं कर्म सुभासुभ दायक। भजहिं मोहि सुर नर मुनि नायक।।
संत असंतन्ह के गुन भाषे। ते न परहिं भव जिन्ह लखि राखे।।
स्रोत अभिलेख 7.41 · पुस्तक पृ. 948, 949
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 त्यागहिं कर्म सुभासुभ दायक। भजहिं मोहि सुर नर मुनि नायक।।
English explanation
They renounce actions that yield good or bad results and worship me, Rama, the lord of gods, humans, and sages.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| त्यागहिं | त्यागते हैं | renounce |
| कर्म | कर्मों को | actions |
| सुभासुभ | शुभ और अशुभ फल | good and bad results |
| दायक | देने वाले | yielding |
| भजहिं | भक्ति करते हैं | worship |
| मोहि | मुझ राम की | me, Rama |
| सुर | देवताओं | gods |
| नर | मनुष्यों | humans |
| मुनि | मुनियों | sages |
| नायक | के नायक | the lord of |
2 संत असंतन्ह के गुन भाषे। ते न परहिं भव जिन्ह लखि राखे।।
English explanation
I have described the characteristics of saints and the unvirtuous; those who understand and keep them in mind do not fall into the cycle of worldly existence.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| संत | संतों | saints |
| असंतन्ह | असंतों | the unvirtuous |
| के | के | of |
| गुन | लक्षण | characteristics |
| भाषे | बताए हैं | have described |
| ते | वे लोग | those people |
| न | नहीं | not |
| परहिं | पड़ते हैं | fall into |
| भव | संसार-चक्र में | the cycle of worldly existence |
| जिन्ह | जिन्होंने | who |
| लखि | समझकर | having understood |
| राखे | ध्यान में रखे हैं | have kept in mind |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 7.41
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 949
- सहायक विषय
- हनुमान्जीके द्वारा भरतजीका प्रश्न और श्रीरामजीका उपदेश
- मुद्रित पृष्ठ
- 948, 949
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।