उत्तरकाण्ड · चौपाई · चौपाई
तेहिं गिरि रुचिर बसइ खग सोई। तासु नास कल्पांत न होई।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दउस सुन्दर पर्वतपर वही पक्षी (काकभुशुण्डि) बसता है। उसका नाश कल्पके अन्तमें भी नहीं होता। मायारचित अनेकों गुण-दोष, मोह, काम आदि अविवेक,॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 962 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
तेहिं गिरि रुचिर बसइ खग सोई। तासु नास कल्पांत न होई।।
माया कृत गुन दोष अनेका। मोह मनोज आदि अबिबेका।।
स्रोत अभिलेख 7.57 · पुस्तक पृ. 962, 962
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 तेहिं गिरि रुचिर बसइ खग सोई। तासु नास कल्पांत न होई।।
English explanation
AI-generated draft: That bird lives on that beautiful mountain. Even at the end of a cosmic aeon, he does not perish.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तेहिं | उस | that; on that |
| गिरि | पर्वत पर | mountain |
| रुचिर | सुंदर | beautiful |
| बसइ | रहता है | dwells |
| खग | पक्षी, काकभुशुंडि | bird, Kakabhushundi |
| सोई | वही | that very one |
| तासु | उसका | his |
| नास | नाश | destruction |
| कल्पांत | कल्प के अंत में | at the end of a cosmic aeon |
| न | नहीं | not |
| होई | होता है | occurs |
2 माया कृत गुन दोष अनेका। मोह मनोज आदि अबिबेका।।
English explanation
The many qualities and faults produced by illusion, delusion, desire, and other forms of lack of discernment—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| माया | माया द्वारा | by illusion (maya) |
| कृत | उत्पन्न | produced |
| गुन | गुण | qualities |
| दोष | दोष | faults |
| अनेका | अनेक | many |
| मोह | मोह | delusion |
| मनोज | काम, कामदेव | desire, personified as the god of love |
| आदि | आदि | and the like |
| अबिबेका | अविवेक के रूप | forms of lack of discernment |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 7.57
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 962
- सहायक विषय
- शिव-पार्वती-संवाद, गरुड़-मोह, गरुड़जीका काकभुशुण्डिसे रामकथा और राम-महिमा सुनना
- मुद्रित पृष्ठ
- 962, 962
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।