उत्तरकाण्ड · चौपाई · चौपाई
तुम्ह जानहु कपि मोर सुभाऊ। भरतहि मोहि कछु अंतर काऊ।।
मूल पाठ
तुम्ह जानहु कपि मोर सुभाऊ। भरतहि मोहि कछु अंतर काऊ।।
सुनि प्रभु बचन भरत गहे चरना। सुनहु नाथ प्रनतारति हरना।।
स्रोत अभिलेख 7.36 · पुस्तक पृ. 944, 944
भावार्थ
मूल पाठ के बाद[भगवान्ने कहा—] हनुमान्! तुम तो मेरा स्वभाव जानते ही हो। भरतके और मेरे बीचमें कभी भी कोई अन्तर (भेद) है? प्रभुके वचन सुनकर भरतजीने उनके चरण पकड़ लिये [और कहा—] हे नाथ! हे शरणागतके दु:खोंको हरनेवाले! सुनिये॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 944 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 तुम्ह जानहु कपि मोर सुभाऊ। भरतहि मोहि कछु अंतर काऊ।।
English explanation
“Hanuman, you know my nature. Is there any difference at all between Bharata and me?”
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तुम्ह | तुम | you |
| जानहु | जानते हो | know |
| कपि | हे वानर हनुमान | O Hanuman, the monkey |
| मोर | मेरा | my |
| सुभाऊ | स्वभाव | nature |
| भरतहि | भरत में | in Bharata |
| मोहि | मुझमें | in me |
| कछु | कुछ भी | any |
| अंतर | भेद | difference |
| काऊ | कोई | whatsoever |
2 सुनि प्रभु बचन भरत गहे चरना। सुनहु नाथ प्रनतारति हरना।।
English explanation
Hearing the Lord’s words, Bharata clasped his feet and said, “Lord, remover of the distress of those who seek refuge, please listen.”
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सुनि | सुनकर | having heard |
| प्रभु | प्रभु राम के | the Lord Rama’s |
| बचन | वचन | words |
| भरत | भरत ने | Bharata |
| गहे | पकड़ लिए | clasped |
| चरना | चरण | feet |
| सुनहु | सुनिए | please listen |
| नाथ | हे स्वामी | O Lord |
| प्रनतारति | शरणागतों के दुःख को | the distress of those who seek refuge |
| हरना | हरने वाले | remover of |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 7.36
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 944
- सहायक विषय
- हनुमान्जीके द्वारा भरतजीका प्रश्न और श्रीरामजीका उपदेश
- मुद्रित पृष्ठ
- 944, 944
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।