उत्तरकाण्ड · चौपाई · चौपाई
तिन्ह ते पुनि मोहि प्रिय निज दासा। जेहि गति मोरि न दूसरि आसा।।
मूल पाठ
तिन्ह ते पुनि मोहि प्रिय निज दासा। जेहि गति मोरि न दूसरि आसा।।
पुनि पुनि सत्य कहउँ तोहि पाहीं। मोहि सेवक सम प्रिय कोउ नाहीं।।
स्रोत अभिलेख 7.86 · पुस्तक पृ. 988, 988
भावार्थ
मूल पाठ के बादविज्ञानियोंसे भी प्रिय मुझे अपना दास है, जिसे मेरी ही गति (आश्रय) है, कोई दूसरी आशा नहीं है। मैं तुझसे बार-बार सत्य ('निज सिद्धान्त) कहता हूँ कि मुझे अपने सेवकके समान प्रिय कोई भी नहीं है॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 988 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1तिन्ह ते पुनि मोहि प्रिय निज दासा। जेहि गति मोरि न दूसरि आसा।।
English explanation
Dearer to me even than these is my own servant, whose refuge is in me and who has no hope in another.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तिन्ह | उन अनुभवी ज्ञानियों | those with realized knowledge |
| ते | से | than |
| पुनि | फिर भी अधिक | still more |
| मोहि | मुझे | to me |
| प्रिय | प्रिय | dear |
| निज | अपना | my own |
| दासा | सेवक | servant |
| जेहि | जिसका | whose |
| गति | आश्रय | refuge |
| मोरि | मैं ही; मेरा आश्रय | in me |
| न | नहीं | no |
| दूसरि | किसी दूसरे से | in another |
| आसा | आशा | hope |
2 पुनि पुनि सत्य कहउँ तोहि पाहीं। मोहि सेवक सम प्रिय कोउ नाहीं।।
English explanation
Again and again I tell you truly: no one is as dear to me as my servant.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| पुनि | फिर | again |
| पुनि | फिर | again |
| सत्य | सत्य | truly |
| कहउँ | मैं कहता हूँ | I say |
| तोहि | तुम्हारे | you |
| पाहीं | पास; तुमसे | to |
| मोहि | मुझे | to me |
| सेवक | सेवक | my servant |
| सम | के समान | as |
| प्रिय | प्रिय | dear |
| कोउ | कोई | anyone |
| नाहीं | नहीं है | there is not |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 7.86
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 988
- सहायक विषय
- शिव-पार्वती-संवाद, गरुड़-मोह, गरुड़जीका काकभुशुण्डिसे रामकथा और राम-महिमा सुनना
- मुद्रित पृष्ठ
- 988, 988
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।