उत्तरकाण्ड · चौपाई · चौपाई
तिन्ह कै दसा देखि रघुबीरा। स्त्रवत नयन जल पुलक सरीरा।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दउनकी [पे्रमविह्वल] दशा देखकर [उन्हींकी भाँति] श्रीरघुनाथजीके नेत्रोंसे भी [प्रेमाश्रुओंका] जल बहने लगा और शरीर पुलकित हो गया। तदनन्तर प्रभुने हाथ पकड़कर श्रेष्ठ मुनियोंको बैठाया और परम मनोहर वचन कहे—॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 942 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
तिन्ह कै दसा देखि रघुबीरा। स्त्रवत नयन जल पुलक सरीरा।।
कर गहि प्रभु मुनिबर बैठारे। परम मनोहर बचन उचारे।।
स्रोत अभिलेख 7.33 · पुस्तक पृ. 941, 942
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 तिन्ह कै दसा देखि रघुबीरा। स्त्रवत नयन जल पुलक सरीरा।।
English explanation
Seeing the sages’ state, Rama’s eyes streamed with tears and his body thrilled with emotion.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तिन्ह | उन मुनियों की | of those sages |
| कै | की | possessive marker |
| दसा | अवस्था | state |
| देखि | देखकर | seeing |
| रघुबीरा | रघुकुल के वीर श्रीराम | Rama, hero of the Raghu lineage |
| स्त्रवत | बहता हुआ | streaming |
| नयन | नेत्रों से | from the eyes |
| जल | आँसू | tears |
| पुलक | रोमांचित | thrilled, with hairs standing on end |
| सरीरा | शरीर | body |
2 कर गहि प्रभु मुनिबर बैठारे। परम मनोहर बचन उचारे।।
English explanation
Taking their hands, the Lord seated the eminent sages and spoke most gracious words.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कर | हाथ | hands |
| गहि | पकड़कर | taking hold of |
| प्रभु | प्रभु श्रीराम ने | Lord Rama |
| मुनिबर | श्रेष्ठ मुनियों को | the eminent sages |
| बैठारे | बैठाया | seated |
| परम | अत्यंत | most |
| मनोहर | मन को प्रिय लगने वाले | gracious and pleasing |
| बचन | वचन | words |
| उचारे | कहे | spoke |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 7.33
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 942
- सहायक विषय
- पुत्रोत्पत्ति, अयोध्याजीकी रमणीयता, सनकादिका आगमन और संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 941, 942
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