उत्तरकाण्ड · चौपाई · चौपाई
ताहि कबहुँ भल कहइ न कोई। गुंजा ग्रहइ परस मनि खोई।।
मूल पाठ
ताहि कबहुँ भल कहइ न कोई। गुंजा ग्रहइ परस मनि खोई।।
आकर चारि लच्छ चौरासी। जोनि भ्रमत यह जिव अबिनासी।।
स्रोत अभिलेख 7.44 · पुस्तक पृ. 951, 951
भावार्थ
मूल पाठ के बादजो पारसमणिको खोकर बदलेमें घुँघची ले लेता है, उसको कभी कोई भला (बुद्धिमान्) नहीं कहता। यह अविनाशी जीव [अण्डज, स्वेदज, जरायुज और उद्भिज्ज] चार खानों और चौरासी लाख योनियोंमें चक्कर लगाता रहता है॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 951 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 ताहि कबहुँ भल कहइ न कोई। गुंजा ग्रहइ परस मनि खोई।।
English explanation
No one ever calls a person wise who loses the philosopher’s stone and takes gunja seeds instead.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| ताहि | उस व्यक्ति को | that person |
| कबहुँ | कभी | ever |
| भल | भला; समझदार | sensible; wise |
| कहइ | कहता है | calls |
| न | नहीं | not |
| कोई | कोई | anyone |
| गुंजा | गुंजा के बीज | gunja seeds |
| ग्रहइ | ग्रहण करता है | takes; accepts |
| परस | पारस | philosopher’s |
| मनि | मणि | stone |
| खोई | खोकर | having lost |
2 आकर चारि लच्छ चौरासी। जोनि भ्रमत यह जिव अबिनासी।।
English explanation
This imperishable soul wanders through the eighty-four lakh forms of birth belonging to four categories.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| आकर | जन्म की श्रेणियाँ | categories of birth |
| चारि | चार | four |
| लच्छ | लाख | lakh; hundred thousand |
| चौरासी | चौरासी | eighty-four |
| जोनि | योनियों में; जन्म-रूपों में | through forms of birth |
| भ्रमत | भटकता है | wanders |
| यह | यह | this |
| जिव | जीव; जीवात्मा | individual soul |
| अबिनासी | अविनाशी | imperishable |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 7.44
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 951
- सहायक विषय
- श्रीरामजीका प्रजाको उपदेश (श्रीरामगीता), पुरवासियोंकी कृतज्ञता
- मुद्रित पृष्ठ
- 951, 951
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