उत्तरकाण्ड · चौपाई · चौपाई
जाने ते छीजहिं कछु पापी। नास न पावहिं जन परितापी।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दप्राणियोंको जलानेवाले ये पापी (रोग) जान लिये जानेसे कुछ क्षीण अवश्य हो जाते हैं, परन्तु नाशको नहीं प्राप्त होते। विषयरूप कुपथ्य पाकर ये मुनियोंके हृदयमें भी अंकुरित हो उठते हैं, तब बेचारे साधारण मनुष्य तो क्या चीज हैं॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 1036 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
जाने ते छीजहिं कछु पापी। नास न पावहिं जन परितापी।।
बिषय कुपथ्य पाइ अंकुरे। मुनिहु हृदयँ का नर बापुरे।।
स्रोत अभिलेख 7.122 · पुस्तक पृ. 1036, 1038
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 जाने ते छीजहिं कछु पापी। नास न पावहिं जन परितापी।।
English explanation
Once recognized, these harmful maladies diminish somewhat, but these afflictions that torment people do not disappear.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जाने | जान लेने से | upon being recognized |
| ते | वे रोग | those maladies |
| छीजहिं | क्षीण होते हैं | diminish |
| कछु | कुछ | somewhat |
| पापी | पापमय या अनिष्टकारी | sinful or harmful |
| नास | नाश | destruction |
| न | नहीं | not |
| पावहिं | पाते हैं | undergo |
| जन | लोगों को | people |
| परितापी | संताप देने वाले | tormenting |
2 बिषय कुपथ्य पाइ अंकुरे। मुनिहु हृदयँ का नर बापुरे।।
English explanation
Fed by the unwholesome diet of sense pleasures, these maladies sprout even in sages’ hearts—what, then, of ordinary mortals!
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बिषय | इंद्रिय-विषय | sense pleasures |
| कुपथ्य | हानिकारक आहार | unwholesome diet |
| पाइ | पाकर | on receiving |
| अंकुरे | अंकुरित होते हैं | sprout |
| मुनिहु | मुनियों के भी | even of sages |
| हृदयँ | हृदय में | in the heart |
| का | क्या कहना | what then of |
| नर | मनुष्य | mortals |
| बापुरे | बेचारे | poor, helpless |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 7.122
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 1036
- सहायक विषय
- भजन-महिमा
- मुद्रित पृष्ठ
- 1036, 1038
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।