उत्तरकाण्ड · चौपाई · चौपाई
जानिअ तब मन बिरुज गोसाँई। जब उर बल बिराग अधिकाई।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दहे गोसाईं! मनको नीरोग हुआ तब जानना चाहिये, जब हृदयमें वैराग्यका बल बढ़ जाय, उत्तम बुद्घिरूपी भूख नित नयी बढ़ती रहे और विषयोंकी आशारूपी दुर्बलता मिट जाय॥ ५॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 1036 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
जानिअ तब मन बिरुज गोसाँई। जब उर बल बिराग अधिकाई।।
सुमति छुधा बाढ़इ नित नई। बिषय आस दुर्बलता गई।।
स्रोत अभिलेख 7.122 · पुस्तक पृ. 1036, 1038
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 जानिअ तब मन बिरुज गोसाँई। जब उर बल बिराग अधिकाई।।
English explanation
O lord, know the mind to be free of disease when the strength of dispassion has increased in the heart.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जानिअ | जानिए | recognize |
| तब | तब | then |
| मन | मन को | the mind |
| बिरुज | रोगरहित | free of disease |
| गोसाँई | हे स्वामी | O lord |
| जब | जब | when |
| उर | हृदय में | in the heart |
| बल | बल | strength |
| बिराग | वैराग्य का | of dispassion |
| अधिकाई | बढ़ जाए | increases |
2 सुमति छुधा बाढ़इ नित नई। बिषय आस दुर्बलता गई।।
English explanation
The appetite of sound understanding grows afresh each day, and the weakness of craving sense pleasures disappears.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सुमति | सद्बुद्धिरूपी | in the form of sound understanding |
| छुधा | भूख | appetite |
| बाढ़इ | बढ़ती है | grows |
| नित | प्रतिदिन | daily |
| नई | नई होकर | afresh |
| बिषय | इंद्रिय-विषयों की | for sense pleasures |
| आस | लालसारूपी | consisting in craving |
| दुर्बलता | दुर्बलता | weakness |
| गई | चली गई | has gone |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 7.122
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 1036
- सहायक विषय
- भजन-महिमा
- मुद्रित पृष्ठ
- 1036, 1038
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।