उत्तरकाण्ड · चौपाई · चौपाई
जय निर्गुन जय जय गुन सागर। सुख मंदिर सुंदर अति नागर।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दहे निर्गुण! आपकी जय हो। हे गुणके समुद्र! आपकी जय हो, जय हो। आप सुखके धाम, [अत्यन्त] सुन्दर और अति चतुर हैं। हे लक्ष्मीपति! आपकी जय हो। हे पृथ्वीके धारण करनेवाले! आपकी जय हो। आप उपमारहित, अजन्मा, अनादि और शोभाकी खान हैं॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 942 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
जय निर्गुन जय जय गुन सागर। सुख मंदिर सुंदर अति नागर।।
जय इंदिरा रमन जय भूधर। अनुपम अज अनादि सोभाकर।।
स्रोत अभिलेख 7.34 · पुस्तक पृ. 942, 943
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 जय निर्गुन जय जय गुन सागर। सुख मंदिर सुंदर अति नागर।।
English explanation
Victory to you who transcend nature’s qualities! Repeated victory to you, ocean of virtues, abode of happiness, beautiful and supremely gracious and refined!
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जय | जय हो | victory to you |
| निर्गुन | प्रकृति के गुणों से परे | beyond nature’s qualities |
| जय | जय हो | victory to you |
| जय | फिर जय हो | victory again |
| गुन | सद्गुणों के | of virtues |
| सागर | सागर | ocean |
| सुख | सुख के | of happiness |
| मंदिर | धाम; निवास | abode |
| सुंदर | सुंदर | beautiful |
| अति | अत्यंत | supremely |
| नागर | चतुर और सुसंस्कृत | gracious, refined, and accomplished |
2 जय इंदिरा रमन जय भूधर। अनुपम अज अनादि सोभाकर।।
English explanation
Victory to you, beloved of Lakshmi! Victory to you, sustainer of the earth, incomparable, unborn, without beginning, and a source of splendor!
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जय | जय हो | victory to you |
| इंदिरा | लक्ष्मी के | of Lakshmi, goddess of prosperity |
| रमन | प्रियतम; पति | beloved; husband |
| जय | जय हो | victory to you |
| भूधर | पृथ्वी को धारण करने वाले | sustainer of the earth |
| अनुपम | जिनकी कोई उपमा नहीं | incomparable |
| अज | अजन्मा | unborn |
| अनादि | जिनका कोई आरंभ नहीं | without beginning |
| सोभाकर | शोभा उत्पन्न करने वाले; शोभा के स्रोत | giver and source of splendor |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 7.34
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 942
- सहायक विषय
- पुत्रोत्पत्ति, अयोध्याजीकी रमणीयता, सनकादिका आगमन और संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 942, 943
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।