उत्तरकाण्ड · चौपाई · चौपाई
गरल सुधासम अरि हित होई। तेहि मनि बिनु सुख पाव न कोई।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दउसके लिये विष अमृतके समान और शत्रु मित्र हो जाता है। उस मणिके बिना कोई सुख नहीं पाता। बड़े-बड़े मानस-रोग, जिनके वश होकर सब जीव दुखी हो रहे हैं, उसको नहीं व्यापते॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 1031 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
गरल सुधासम अरि हित होई। तेहि मनि बिनु सुख पाव न कोई।।
ब्यापहिं मानस रोग न भारी। जिन्ह के बस सब जीव दुखारी।।
स्रोत अभिलेख 7.12 · पुस्तक पृ. 1030, 1032
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 गरल सुधासम अरि हित होई। तेहि मनि बिनु सुख पाव न कोई।।
English explanation
Poison becomes like nectar, and an enemy becomes a well-wisher. Without that jewel, no one finds happiness.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| गरल | विष | poison |
| सुधासम | अमृत के समान | like nectar |
| अरि | शत्रु | enemy |
| हित | हितैषी | well-wisher |
| होई | हो जाता है | becomes |
| तेहि | उस | that |
| मनि | भक्ति रूपी मणि | jewel of devotion |
| बिनु | के बिना | without |
| सुख | सुख | happiness |
| पाव | पाता है | obtains |
| न | नहीं | not |
| कोई | कोई | anyone |
2 ब्यापहिं मानस रोग न भारी। जिन्ह के बस सब जीव दुखारी।।
English explanation
The grave ailments of the mind, under whose sway all beings suffer, do not afflict that person.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| ब्यापहिं | व्याप्त होकर सताते हैं | afflict |
| मानस | मन के | of the mind |
| रोग | रोग | ailments |
| न | नहीं | not |
| भारी | गंभीर | grave |
| जिन्ह | जिनके | whose |
| के | के | of |
| बस | वश में | under the sway |
| सब | सभी | all |
| जीव | जीव | living beings |
| दुखारी | दुखी हैं | are suffering |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 7.12
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 1031
- सहायक विषय
- ज्ञान-भक्ति-निरूपण, ज्ञानदीपक और भक्तिकी महान् महिमा
- मुद्रित पृष्ठ
- 1030, 1032
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