उत्तरकाण्ड · चौपाई · चौपाई
कोउ सर्बग्य धर्मरत कोई। सब पर पितहि प्रीति सम होई।।
मूल पाठ
कोउ सर्बग्य धर्मरत कोई। सब पर पितहि प्रीति सम होई।।
कोउ पितु भगत बचन मन कर्मा। सपनेहुँ जान न दूसर धर्मा।।
स्रोत अभिलेख 7.87 · पुस्तक पृ. 989, 989
भावार्थ
मूल पाठ के बादकोई सर्वज्ञ और कोई धर्मपरायण होता है। पिताका प्रेम इन सभीपर समान होता है। परन्तु इनमेंसे यदि कोई मन, वचन और कर्मसे पिताका ही भक्त होता है, स्वप्रमें भी दूसरा धर्म नहीं जानता,॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 989 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 कोउ सर्बग्य धर्मरत कोई। सब पर पितहि प्रीति सम होई।।
English explanation
One is all-knowing, another devoted to righteousness; the father's love is equal toward them all.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कोउ | कोई | one |
| सर्बग्य | सब कुछ जानने वाला | all-knowing |
| धर्मरत | धर्म में लगा हुआ | devoted to righteousness |
| कोई | कोई | another |
| सब | सभी | all |
| पर | के प्रति | toward |
| पितहि | पिता को | the father has |
| प्रीति | प्रेम | love |
| सम | समान | equal |
| होई | होता है | is |
2 कोउ पितु भगत बचन मन कर्मा। सपनेहुँ जान न दूसर धर्मा।।
English explanation
One son is devoted to his father in speech, mind, and deed; even in a dream, he knows no other duty.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कोउ | कोई पुत्र | one son |
| पितु | पिता का | to his father |
| भगत | भक्त; समर्पित | devoted |
| बचन | वचन से | in speech |
| मन | मन से | in mind |
| कर्मा | कर्म से | in deed |
| सपनेहुँ | सपने में भी | even in a dream |
| जान | जानता है | knows |
| न | नहीं | not |
| दूसर | दूसरा | other |
| धर्मा | धर्म या कर्तव्य | duty |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 7.87
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 989
- सहायक विषय
- शिव-पार्वती-संवाद, गरुड़-मोह, गरुड़जीका काकभुशुण्डिसे रामकथा और राम-महिमा सुनना
- मुद्रित पृष्ठ
- 989, 989
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