उत्तरकाण्ड · चौपाई · चौपाई
कीन्ह दंडवत तीनिउँ भाई। सहित पवनसुत सुख अधिकाई।।
मूल पाठ
कीन्ह दंडवत तीनिउँ भाई। सहित पवनसुत सुख अधिकाई।।
मुनि रघुपति छबि अतुल बिलोकी। भए मगन मन सके न रोकी।।
स्रोत अभिलेख 7.33 · पुस्तक पृ. 941, 942
भावार्थ
मूल पाठ के बादफिर हनुमान्जीसहित तीनों भाइयोंने दण्डवत् की, सबको बड़ा सुख हुआ। मुनि श्रीरघुनाथजीकी अतुलनीय छबि देखकर उसीमें मग्र हो गये। वे मनको रोक न सके॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 941 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 कीन्ह दंडवत तीनिउँ भाई। सहित पवनसुत सुख अधिकाई।।
English explanation
AI-draft meaning: The three brothers, together with Hanuman, bowed in full prostration and felt great joy.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कीन्ह | किया | performed |
| दंडवत | भूमि पर पूरा शरीर झुकाकर प्रणाम | full prostration |
| तीनिउँ | तीनों | all three |
| भाई | भाई—भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न | brothers—Bharata, Lakshmana, and Shatrughna |
| सहित | के साथ | together with |
| पवनसुत | पवनपुत्र हनुमान | Hanuman, son of the wind god |
| सुख | आनंद | joy |
| अधिकाई | बहुत अधिक | in great measure |
2 मुनि रघुपति छबि अतुल बिलोकी। भए मगन मन सके न रोकी।।
English explanation
Seeing Rama’s incomparable beauty, the sages became absorbed in delight and could not restrain their minds.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मुनि | मुनिगण | the sages |
| रघुपति | रघुकुल के स्वामी श्रीराम की | of Rama, lord of the Raghu lineage |
| छबि | सुंदर छवि | beauty |
| अतुल | जिसकी तुलना न हो | incomparable |
| बिलोकी | देखकर | having beheld |
| भए | हो गए | became |
| मगन | आनंद में डूबे | absorbed in delight |
| मन | अपने मन को | their minds |
| सके | सक्षम हुए | were able |
| न | नहीं | not |
| रोकी | रोकना | to restrain |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 7.33
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 941
- सहायक विषय
- पुत्रोत्पत्ति, अयोध्याजीकी रमणीयता, सनकादिका आगमन और संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 941, 942
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