उत्तरकाण्ड · चौपाई · चौपाई
एहि बिधि अमिति जुगुति मन गुनऊँ। मुनि उपदेस न सादर सुनऊँ।।
मूल पाठ
एहि बिधि अमिति जुगुति मन गुनऊँ। मुनि उपदेस न सादर सुनऊँ।।
पुनि पुनि सगुन पच्छ मैं रोपा। तब मुनि बोलेउ बचन सकोपा।।
स्रोत अभिलेख 7.112 · पुस्तक पृ. 1018, 1019
भावार्थ
मूल पाठ के बादइस प्रकार मैं अनगिनत युक्तियाँ मनमें विचारता था और आदरके साथ मुनिका उपदेश नहीं सुनता था। जब मैंने बार-बार सगुणका पक्ष स्थापित किया, तब मुनि क्रोधयुक्त वचन बोले—॥ ६॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 1019 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 एहि बिधि अमिति जुगुति मन गुनऊँ। मुनि उपदेस न सादर सुनऊँ।।
English explanation
Thus I pondered countless arguments in my mind and did not listen respectfully to the sage's teaching.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| एहि | इस | this |
| बिधि | प्रकार | manner |
| अमिति | असंख्य | countless |
| जुगुति | तर्क | arguments |
| मन | मन में | in my mind |
| गुनऊँ | मैं विचारता हूँ | I ponder |
| मुनि | मुनि का | the sage's |
| उपदेस | उपदेश | teaching |
| न | नहीं | not |
| सादर | आदरपूर्वक | respectfully |
| सुनऊँ | मैं सुनता हूँ | I listen |
2 पुनि पुनि सगुन पच्छ मैं रोपा। तब मुनि बोलेउ बचन सकोपा।।
English explanation
Again and again I firmly upheld the position that God has attributes. Then the sage spoke angrily.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| पुनि | फिर | again |
| पुनि | फिर | again |
| सगुन | गुण और रूप वाले ईश्वर का | of God with attributes and form |
| पच्छ | पक्ष | position |
| मैं | मैंने | I |
| रोपा | दृढ़ता से स्थापित किया | firmly upheld |
| तब | तब | then |
| मुनि | मुनि | the sage |
| बोलेउ | बोले | spoke |
| बचन | वचन | words |
| सकोपा | क्रोध सहित | angrily |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 7.112
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 1019
- सहायक विषय
- काकभुशुण्डिजीका लोमशजीके पास जाना और शाप तथा अनुग्रह पाना
- मुद्रित पृष्ठ
- 1018, 1019
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।