उत्तरकाण्ड · चौपाई · चौपाई
अस बिचारि हरि भगत सयाने। मुक्ति निरादर भगति लुभाने।।
मूल पाठ
अस बिचारि हरि भगत सयाने। मुक्ति निरादर भगति लुभाने।।
भगति करत बिनु जतन प्रयासा। संसृति मूल अबिद्या नासा।।
स्रोत अभिलेख 7.119 · पुस्तक पृ. 1029, 1030
भावार्थ
मूल पाठ के बादऐसा विचारकर बुद्धिमान् हरिभक्त भक्तिपर लुभाये रहकर मुक्तिका तिरस्कार कर देते हैं। भक्ति करनेसे संसृति (जन्म-मृत्युरूप संसार) की जड़ अविद्या बिना ही यत्न और परिश्रमके (अपने- आप) वैसे ही नष्ट हो जाती है,॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 1030 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 अस बिचारि हरि भगत सयाने। मुक्ति निरादर भगति लुभाने।।
English explanation
Reflecting thus, discerning devotees of Hari disregard liberation and are drawn to devotion.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अस | ऐसा | thus |
| बिचारि | विचार करके | having considered |
| हरि | भगवान हरि के | of Lord Hari |
| भगत | भक्त | devotees |
| सयाने | विवेकी | discerning |
| मुक्ति | मुक्ति को | liberation |
| निरादर | महत्त्व न देकर | disregarding |
| भगति | भक्ति में | to devotion |
| लुभाने | अनुरक्त होते हैं | are drawn |
2 भगति करत बिनु जतन प्रयासा। संसृति मूल अबिद्या नासा।।
English explanation
Through practicing devotion, ignorance—the root of the cycle of birth and death—is destroyed without separate exertion or effort.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| भगति | भक्ति | devotion |
| करत | करने पर | upon practicing |
| बिनु | बिना | without |
| जतन | यत्न | exertion |
| प्रयासा | प्रयास के | effort |
| संसृति | जन्म-मरण के संसार की | of the cycle of birth and death |
| मूल | जड़ | root |
| अबिद्या | अविद्या; वास्तविक स्वरूप का अज्ञान | ignorance of reality |
| नासा | नष्ट हो जाती है | is destroyed |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 7.119
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 1030
- सहायक विषय
- ज्ञान-भक्ति-निरूपण, ज्ञानदीपक और भक्तिकी महान् महिमा
- मुद्रित पृष्ठ
- 1029, 1030
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।