सुन्दरकाण्ड · दोहा 23 · दोहा/सोरठा
मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान।
मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान।
भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान।।23।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 5.23 · पुस्तक पृ. 735, 735
भावार्थ और शब्दार्थ
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1मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान।
मोह की जड़, अनेक पीड़ाएँ देने वाले, अज्ञानरूपी अंधकार से भरे अहंकार को छोड़ो।
English explanation
Abandon pride, the root of delusion, a source of many pains, and a darkness of ignorance.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मोहमूल | मोह की जड़ | the root of delusion |
| बहु | अनेक | many |
| सूल | पीड़ाएँ | pains |
| प्रद | देने वाला | causing |
| त्यागहु | छोड़ो | abandon |
| तम | अज्ञानरूपी अंधकार | darkness of ignorance |
| अभिमान | अहंकार | pride |
2 भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान।।23।।
रघुकुल के नायक, कृपा के सागर भगवान राम का भजन करो।
English explanation
Worship Lord Rama, leader of Raghu’s lineage and ocean of compassion.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| भजहु | भजन करो, भक्ति करो | worship, be devoted to |
| राम | राम | Rama |
| रघुनायक | रघुकुल के नायक | leader of Raghu’s lineage |
| कृपा | कृपा का | of compassion |
| सिंधु | सागर | ocean |
| भगवान | भगवान | the Lord |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- सुन्दरकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 23
- स्रोत अभिलेख
- 5.23
- सहायक विषय
- हनुमान्-रावण-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 735, 735
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