सुन्दरकाण्ड · दोहा 40 · दोहा/सोरठा
तात चरन गहि मागउँ राखहु मोर दुलार।
तात चरन गहि मागउँ राखहु मोर दुलार।
सीत देहु राम कहुँ अहित न होइ तुम्हार।।40।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 5.4 · पुस्तक पृ. 750, 751
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1तात चरन गहि मागउँ राखहु मोर दुलार।
हे तात, तुम्हारे चरण पकड़कर विनती करता हूँ: मेरे प्रति अपना स्नेह बनाए रखो और मेरी विनती का मान रखो।
English explanation
Dear brother, clasping your feet, I plead: honor your affection for me and heed my appeal.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तात | हे तात; हे प्रिय भाई | dear brother |
| चरन | तुम्हारे चरण | your feet |
| गहि | पकड़कर | clasping |
| मागउँ | मैं विनती करता हूँ | I plead |
| राखहु | बनाए रखो; मान रखो | preserve; honor |
| मोर | मेरे प्रति | for me |
| दुलार | स्नेह | affection |
2 सीत देहु राम कहुँ अहित न होइ तुम्हार।।40।।
सीता को राम को लौटा दो, जिससे तुम्हारा अहित न हो।
English explanation
Return Sita to Rama, so that no harm comes to you.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सीत | सीता को | Sita |
| देहु | दे दो; लौटा दो | give back; return |
| राम | राम, सीता के पति | Rama, Sita’s husband |
| कहुँ | को | to |
| अहित | हानि | harm |
| न | नहीं | not |
| होइ | हो | occur |
| तुम्हार | तुम्हारा | to you; your |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- सुन्दरकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 40
- स्रोत अभिलेख
- 5.4
- सहायक विषय
- रावणको विभीषणका समझाना और विभीषणका अपमान
- मुद्रित पृष्ठ
- 750, 751
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।