सुन्दरकाण्ड · चौपाई · चौपाई
सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी। नहिं अघात श्रवनामृत जानी।।
मूल पाठ
सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी। नहिं अघात श्रवनामृत जानी।।
पद अंबुज गहि बारहिं बारा। हृदयँ समात न प्रेमु अपारा।।
स्रोत अभिलेख 5.49 · पुस्तक पृ. 758, 759
भावार्थ
मूल पाठ के बादप्रभुकी वाणी सुनते हैं और उसे कानोंके लिये अमृत जानकर विभीषणजी अघाते नहीं हैं। वे बार-बार श्रीरामजीके चरणकमलोंको पकड़ते हैं। अपार प्रेम है, हृदयमें समाता नहीं है॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 758 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी। नहिं अघात श्रवनामृत जानी।।
English explanation
Recognizing the Lord’s words as nectar for the ears, Vibhishana cannot hear enough of them.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सुनत | सुनते हुए | while listening |
| बिभीषनु | विभीषण | Vibhishana, Ravana’s brother |
| प्रभु | प्रभु राम | Lord Rama |
| कै | की | of |
| बानी | वाणी | speech |
| नहिं | नहीं | not |
| अघात | तृप्त होते | become satisfied |
| श्रवनामृत | कानों के लिए अमृत | nectar for the ears |
| जानी | जानकर | recognizing as |
2 पद अंबुज गहि बारहिं बारा। हृदयँ समात न प्रेमु अपारा।।
English explanation
He repeatedly clasps the Lord’s lotus feet; his boundless love cannot be contained within his heart.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| पद | चरण | feet |
| अंबुज | कमल | lotuses |
| गहि | पकड़कर; पकड़ते हुए | clasping |
| बारहिं | बार-बार | repeatedly |
| बारा | बार | time after time |
| हृदयँ | हृदय में | within the heart |
| समात | समाता | is contained |
| न | नहीं | not |
| प्रेमु | प्रेम | love |
| अपारा | असीम | boundless |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- सुन्दरकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 5.49
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 758
- सहायक विषय
- विभीषणका भगवान् श्रीरामजीकी शरणके लिये प्रस्थान और शरणप्राप्ति
- मुद्रित पृष्ठ
- 758, 759
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।