सुन्दरकाण्ड · चौपाई · चौपाई
कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू।।
मूल पाठ
कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू।।
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं।।
स्रोत अभिलेख 5.44 · पुस्तक पृ. 754, 754
भावार्थ
मूल पाठ के बादजिसे करोड़ों ब्राह्मणोंकी हत्या लगी हो, शरणमें आनेपर मैं उसे भी नहीं त्यागता। जीव ज्यों ही मेरे सम्मुख होता है, त्यों ही उसके करोड़ों जन्मोंके पाप नष्ट हो जाते हैं॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 754 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू।।
English explanation
AI draft: Rama says—even someone burdened with the sins of killing ten million Brahmins, I do not forsake if he comes seeking refuge.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कोटि | करोड़ | ten million |
| बिप्र | ब्राह्मणों का | of Brahmins |
| बध | वध का पाप | the sin of killing |
| लागहिं | लगे हों | are incurred |
| जाहू | जिसे | by whom |
| आएँ | आने पर | upon coming |
| सरन | शरण में | for refuge |
| तजउँ | मैं त्यागता हूँ | I forsake |
| नहिं | नहीं | not |
| ताहू | उसे भी | even him |
2 सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं।।
English explanation
The moment a living being turns toward me, the sins of ten million lifetimes perish.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सनमुख | उन्मुख | turned toward |
| होइ | होता है | becomes |
| जीव | जीव | a living being |
| मोहि | मेरी ओर | toward me |
| जबहीं | जैसे ही | the moment that |
| जन्म | जन्मों के | of lifetimes |
| कोटि | करोड़ | ten million |
| अघ | पाप | sins |
| नासहिं | नष्ट हो जाते हैं | perish |
| तबहीं | उसी क्षण | at that very moment |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- सुन्दरकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 5.44
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 754
- सहायक विषय
- विभीषणका भगवान् श्रीरामजीकी शरणके लिये प्रस्थान और शरणप्राप्ति
- मुद्रित पृष्ठ
- 754, 754
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।