सुन्दरकाण्ड · दोहा 43 · दोहा/सोरठा
सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि।
सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि।
ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि।।43।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 5.43 · पुस्तक पृ. 753, 754
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि।
जो लोग अपनी हानि की आशंका करके शरण में आए हुए को त्याग देते हैं—
English explanation
Those who abandon someone seeking refuge, anticipating harm to themselves—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सरनागत | शरण में आए हुए | one seeking refuge |
| कहुँ | को | the object marker |
| जे | जो लोग | those who |
| तजहिं | त्याग देते हैं | abandon |
| निज | अपनी | their own |
| अनहित | हानि; अहित | harm; detriment |
| अनुमानि | अनुमान करके | anticipating |
2 ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि।।43।।
वे मनुष्य नीच और पापमय हैं; उन्हें देखने मात्र से हानि होती है।
English explanation
Those people are base and full of sin; even looking at them brings harm.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| ते | वे | those |
| नर | मनुष्य | people |
| पावँर | नीच; अधम | base; vile |
| पापमय | पाप से भरे हुए | full of sin |
| तिन्हहि | उन्हीं को | those very people |
| बिलोकत | देखने से | on looking at |
| हानि | हानि होती है | harm results |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- सुन्दरकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 43
- स्रोत अभिलेख
- 5.43
- सहायक विषय
- विभीषणका भगवान् श्रीरामजीकी शरणके लिये प्रस्थान और शरणप्राप्ति
- मुद्रित पृष्ठ
- 753, 754
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।