सुन्दरकाण्ड · दोहा 42 · दोहा/सोरठा
जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि भरतु रहे मन लाइ।
जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि भरतु रहे मन लाइ।
ते पद आजु बिलोकिहउँ इन्ह नयनन्हि अब जाइ।।42।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 5.42 · पुस्तक पृ. 752, 753
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि भरतु रहे मन लाइ।
जिन चरणों की पादुकाओं में भरत मन लगाए रहे—
English explanation
Those feet to whose sandals Bharata remained devoted—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जिन्ह | जिन | whose |
| पायन्ह | चरणों | feet |
| के | की | of |
| पादुकन्हि | पादुकाओं में | to the sandals |
| भरतु | भरत, राम के भाई | Bharata, Rama's brother |
| रहे | रहे | remained |
| मन | मन | his mind |
| लाइ | लगाए हुए | fixed in devotion |
2 ते पद आजु बिलोकिहउँ इन्ह नयनन्हि अब जाइ।।42।।
उन्हीं चरणों को आज मैं अब जाकर इन आँखों से देखूँगा।
English explanation
Today I shall now go and behold those very feet with these eyes.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| ते | वे ही | those very |
| पद | चरण | feet |
| आजु | आज | today |
| बिलोकिहउँ | मैं देखूँगा | I shall behold |
| इन्ह | इन | these |
| नयनन्हि | आँखों से | with my eyes |
| अब | अब | now |
| जाइ | जाकर | having gone |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- सुन्दरकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 42
- स्रोत अभिलेख
- 5.42
- सहायक विषय
- विभीषणका भगवान् श्रीरामजीकी शरणके लिये प्रस्थान और शरणप्राप्ति
- मुद्रित पृष्ठ
- 752, 753
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।