लङ्काकाण्ड · दोहा 86 · दोहा
सोभा देखि हरषि सुर बरषहिं सुमन अपार।
सोभा देखि हरषि सुर बरषहिं सुमन अपार।
जय जय जय करुनानिधि छबि बल गुन आगार॥ ८६॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 6.86 · पुस्तक पृ. 857, 858
भावार्थ और शब्दार्थ
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1सोभा देखि हरषि सुर बरषहिं सुमन अपार।
उनकी शोभा देखकर देवता हर्षित हुए और असंख्य फूल बरसाने लगे।
English explanation
Seeing his splendor, the gods rejoiced and showered countless flowers.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सोभा | सुंदरता और शोभा | beauty and splendor |
| देखि | देखकर | seeing |
| हरषि | हर्षित होकर | rejoicing |
| सुर | देवता | the gods |
| बरषहिं | बरसाते हैं | shower |
| सुमन | फूल | flowers |
| अपार | असंख्य | countless |
2जय जय जय करुनानिधि छबि बल गुन आगार॥ ८६॥
हे करुणा के भंडार, सौंदर्य, बल और गुणों के धाम! आपकी जय हो, जय हो, जय हो!
English explanation
Victory, victory, victory to you, treasure of compassion and abode of beauty, strength, and virtues!
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जय | जय हो | victory to you |
| जय | जय हो | victory to you |
| जय | जय हो | victory to you |
| करुनानिधि | हे करुणा के भंडार | O treasure of compassion |
| छबि | सुंदरता | beauty |
| बल | शक्ति | strength |
| गुन | सद्गुणों के | of virtues |
| आगार | धाम; भंडार | abode; repository |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- दोहा 86
- स्रोत अभिलेख
- 6.86
- सहायक विषय
- रावण-मूर्च्छा, रावण-यज्ञ-विध्वंस, राम-रावण-युद्ध
- मुद्रित पृष्ठ
- 857, 858
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