लङ्काकाण्ड · दोहा 85 · दोहा
जग्य बिधंसि कुसल कपि आए रघुपति पास।
जग्य बिधंसि कुसल कपि आए रघुपति पास।
चलेउ निसाचर क्रुद्ध होइ त्यागि जिवन कै आस॥ ८५॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 6.85 · पुस्तक पृ. 856, 857
भावार्थ और शब्दार्थ
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1जग्य बिधंसि कुसल कपि आए रघुपति पास।
यज्ञ को नष्ट करके वानर सकुशल श्रीराम के पास लौट आए।
English explanation
After destroying the sacrifice, the monkeys returned safely to Rama.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जग्य | यज्ञ | the sacrifice |
| बिधंसि | नष्ट करके | having destroyed |
| कुसल | सकुशल | safely; unharmed |
| कपि | वानर | the monkeys |
| आए | आए; लौट आए | came; returned |
| रघुपति | श्रीराम, रघुवंश के स्वामी | Rama, lord of the Raghu lineage |
| पास | के पास | to; near |
2चलेउ निसाचर क्रुद्ध होइ त्यागि जिवन कै आस॥ ८५॥
रावण क्रोधित होकर, जीवित रहने की आशा छोड़कर चल पड़ा।
English explanation
Ravana set out in anger, abandoning hope of remaining alive.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| चलेउ | चल पड़ा | set out |
| निसाचर | राक्षस रावण | the demon Ravana |
| क्रुद्ध | क्रोधित | angry |
| होइ | होकर | having become |
| त्यागि | त्यागकर | abandoning |
| जिवन | जीवन; जीवित रहना | life; remaining alive |
| कै | की | of |
| आस | आशा | hope |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- दोहा 85
- स्रोत अभिलेख
- 6.85
- सहायक विषय
- रावण-मूर्च्छा, रावण-यज्ञ-विध्वंस, राम-रावण-युद्ध
- मुद्रित पृष्ठ
- 856, 857
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