लङ्काकाण्ड · दोहा 4 · दोहा/सोरठा
सेतुबंध भइ भीर अति कपि नभ पंथ उड़ाहिं।
सेतुबंध भइ भीर अति कपि नभ पंथ उड़ाहिं।
अपर जलचरन्हि ऊपर चढ़ि चढ़ि पारहि जाहिं।।4।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 6.4 · पुस्तक पृ. 775, 776
भावार्थ और शब्दार्थ
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1सेतुबंध भइ भीर अति कपि नभ पंथ उड़ाहिं।
सेतु पर बहुत भीड़ हो गई; वानर आकाश के मार्ग से उड़ने लगे।
English explanation
The bridge became very crowded; monkeys flew along the route through the sky.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सेतुबंध | सेतु पर | on the bridge |
| भइ | हो गई | arose |
| भीर | भीड़ | crowding |
| अति | बहुत | great |
| कपि | वानर | monkeys |
| नभ | आकाश का | through the sky |
| पंथ | मार्ग | route |
| उड़ाहिं | उड़ते हैं | fly |
2 अपर जलचरन्हि ऊपर चढ़ि चढ़ि पारहि जाहिं।।4।।
दूसरे वानर जलजीवों के ऊपर चढ़-चढ़कर पार जाते हैं।
English explanation
Other monkeys cross over by climbing onto the aquatic creatures.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अपर | अन्य वानर | other monkeys |
| जलचरन्हि | जलजीवों के | of aquatic creatures |
| ऊपर | ऊपर | on top |
| चढ़ि | चढ़कर | climbing |
| चढ़ि | बार-बार चढ़कर | climbing successively |
| पारहि | पार की ओर | to the other side |
| जाहिं | जाते हैं | go |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 4
- स्रोत अभिलेख
- 6.4
- सहायक विषय
- नल-नीलद्वारा पुल बाँधना, श्रीरामजीद्वारा श्रीरामेश्वरकी स्थापना
- मुद्रित पृष्ठ
- 775, 776
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।