लङ्काकाण्ड · दोहा 3 · दोहा/सोरठा
श्री रघुबीर प्रताप ते सिंधु तरे पाषान।
श्री रघुबीर प्रताप ते सिंधु तरे पाषान।
ते मतिमंद जे राम तजि भजहिं जाइ प्रभु आन।।3।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 6.3 · पुस्तक पृ. 774, 775
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1श्री रघुबीर प्रताप ते सिंधु तरे पाषान।
श्रीराम के प्रताप से पत्थर समुद्र पर तैर गए।
English explanation
Through the power of Rama, the stones floated upon the ocean.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| श्री | आदरसूचक ‘श्री’ | revered |
| रघुबीर | रघुकुल के वीर राम | Rama, hero of Raghu’s lineage |
| प्रताप | महिमा, प्रभाव | power, might |
| ते | से | through |
| सिंधु | समुद्र में | upon the ocean |
| तरे | तैरे | floated |
| पाषान | पत्थर | stones |
2 ते मतिमंद जे राम तजि भजहिं जाइ प्रभु आन।।3।।
वे मंदबुद्धि हैं जो राम को छोड़कर किसी अन्य प्रभु को भजने जाते हैं।
English explanation
Those who abandon Rama and go to worship another lord are dull-witted.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| ते | वे | those |
| मतिमंद | मंदबुद्धि | dull-witted |
| जे | जो | who |
| राम | राम को | Rama |
| तजि | छोड़कर | having abandoned |
| भजहिं | भजते हैं | worship |
| जाइ | जाकर | going |
| प्रभु | प्रभु को | a lord |
| आन | दूसरे | another |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 3
- स्रोत अभिलेख
- 6.3
- सहायक विषय
- नल-नीलद्वारा पुल बाँधना, श्रीरामजीद्वारा श्रीरामेश्वरकी स्थापना
- मुद्रित पृष्ठ
- 774, 775
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।