लङ्काकाण्ड · दोहा 2 · दोहा/सोरठा
संकर प्रिय मम द्रोही सिव द्रोही मम दास।
संकर प्रिय मम द्रोही सिव द्रोही मम दास।
ते नर करहि कलप भरि धोर नरक महुँ बास।।2।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 6.2 · पुस्तक पृ. 773, 774
भावार्थ और शब्दार्थ
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1संकर प्रिय मम द्रोही सिव द्रोही मम दास।
जो शंकर को प्रिय मानते हैं पर मुझसे द्वेष करते हैं, और जो शिव से द्वेष करते हैं पर मेरे दास कहलाते हैं—
English explanation
Those who hold Shiva dear but are hostile to me, and those who are hostile to Shiva but call themselves my servants—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| संकर | शंकर अर्थात् शिव | Shiva |
| प्रिय | प्रिय मानने वाले | holding dear |
| मम | मेरे प्रति | toward me |
| द्रोही | द्वेष करने वाले | hostile |
| सिव | शिव के प्रति | toward Shiva |
| द्रोही | द्वेष करने वाले | hostile |
| मम | मेरे | my |
| दास | दास कहलाने वाले | professed servants |
2 ते नर करहि कलप भरि धोर नरक महुँ बास।।2।।
वे मनुष्य एक कल्प भर भयंकर नरक में निवास करते हैं।
English explanation
Those people dwell in a terrible hell for an entire cosmic age.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| ते | वे | those |
| नर | मनुष्य | people |
| करहि | करते हैं | make |
| कलप | एक कल्प | a cosmic age |
| भरि | भर | throughout |
| धोर | भयंकर | terrible |
| नरक | नरक | hell |
| महुँ | में | in |
| बास | निवास | their dwelling |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 2
- स्रोत अभिलेख
- 6.2
- सहायक विषय
- नल-नीलद्वारा पुल बाँधना, श्रीरामजीद्वारा श्रीरामेश्वरकी स्थापना
- मुद्रित पृष्ठ
- 773, 774
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