लङ्काकाण्ड · दोहा 80 (क) · दोहा/सोरठा
महा अजय संसार रिपु जीति सकइ सो बीर।
महा अजय संसार रिपु जीति सकइ सो बीर।
जाकें अस रथ होइ दृढ़ सुनहु सखा मतिधीर।।80(क)।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 6.8 · पुस्तक पृ. 850, 851
भावार्थ और शब्दार्थ
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1महा अजय संसार रिपु जीति सकइ सो बीर।
वह वीर संसाररूपी अत्यंत दुर्जेय शत्रु को भी जीत सकता है—
English explanation
That warrior can conquer even the exceedingly hard-to-conquer enemy of worldly existence—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| महा | अत्यंत | exceedingly |
| अजय | दुर्जेय | hard to conquer |
| संसार | संसार; सांसारिक अस्तित्व | worldly existence |
| रिपु | शत्रु | enemy |
| जीति | जीत | conquer |
| सकइ | सकता है | can |
| सो | वह | that |
| बीर | वीर | warrior |
2 जाकें अस रथ होइ दृढ़ सुनहु सखा मतिधीर।।80(क)।।
—जिसके पास ऐसा दृढ़ रथ हो। हे स्थिरबुद्धि मित्र, सुनो।
English explanation
—who possesses such a firm chariot. Listen, my steadfast-minded friend.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जाकें | जिसके पास | whoever possesses |
| अस | ऐसा | such |
| रथ | रथ | chariot |
| होइ | हो | has; possesses |
| दृढ़ | दृढ़ | firm; steadfast |
| सुनहु | सुनो | listen |
| सखा | हे मित्र | O friend |
| मतिधीर | स्थिर बुद्धि वाले | steadfast-minded |
| क | पद्य-संदर्भ का उपचिह्न ‘क’ | verse-reference submarker ‘क’ |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 80 (क)
- स्रोत अभिलेख
- 6.8
- सहायक विषय
- रावणका युद्धके लिये प्रस्थान और श्रीरामजीका विजय-रथ तथा वानर-राक्षसोंका युद्ध
- मुद्रित पृष्ठ
- 850, 851
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