लङ्काकाण्ड · दोहा 64 · दोहा/सोरठा
बचन कर्म मन कपट तजि भजेहु राम रनधीर।
बचन कर्म मन कपट तजि भजेहु राम रनधीर।
जाहु न निज पर सूझ मोहि भयउँ कालबस बीर। 64।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 6.64 · पुस्तक पृ. 833, 834
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1बचन कर्म मन कपट तजि भजेहु राम रनधीर।
वचन, कर्म और मन से कपट छोड़कर रण में धीर राम को भजो।
English explanation
Abandon deceit in speech, action, and thought, and worship Rama, steadfast in battle.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बचन | वचन में | in speech |
| कर्म | कर्म में | in action |
| मन | मन में | in thought |
| कपट | छल | deceit |
| तजि | त्यागकर | abandoning |
| भजेहु | भजो | worship |
| राम | राम को | Rama |
| रनधीर | रण में धीर और वीर | steadfast and valiant in battle |
2 जाहु न निज पर सूझ मोहि भयउँ कालबस बीर। 64।।
हे वीर, चले जाओ; मुझे अपना और पराया नहीं सूझ रहा, मैं काल के वश में हो गया हूँ।
English explanation
Go, brave brother; I can no longer distinguish my own from others, for I have fallen under death's sway.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जाहु | चले जाओ | go away |
| न | नहीं | not |
| निज | अपना | one's own |
| पर | पराया | others |
| सूझ | पहचान में आता | can distinguish |
| मोहि | मुझे | to me |
| भयउँ | मैं हो गया हूँ | I have become |
| कालबस | काल के अधीन | subject to death |
| बीर | हे वीर भाई | brave brother |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 64
- स्रोत अभिलेख
- 6.64
- सहायक विषय
- रावणका कुम्भकर्णको जगाना, कुम्भकर्णका रावणको उपदेश और विभीषण-कुम्भकर्ण-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 833, 834
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