लङ्काकाण्ड · दोहा 93 · दोहा
पुनि दसकंठ क्रुद्ध होइ छाँड़ी सक्ति प्रचंड।
मूल पाठ
पुनि दसकंठ क्रुद्ध होइ छाँड़ी सक्ति प्रचंड।
चली बिभीषन सन्मुख मनहुँ काल कर दंड॥ ९३॥
स्रोत अभिलेख 6.93 · पुस्तक पृ. 866, 867
भावार्थ
मूल पाठ के बादफिर रावणने क्रोधित होकर प्रचण्ड शक्ति छोड़ी। वह विभीषणके सामने ऐसी चली जैसे काल (यमराज) का दण्ड हो॥ ९३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 867 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1पुनि दसकंठ क्रुद्ध होइ छाँड़ी सक्ति प्रचंड।
English explanation
Then the ten-necked Ravana grew angry and hurled a formidable spear-like weapon.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| पुनि | फिर | then |
| दसकंठ | दस कंठों वाला रावण | the ten-necked Ravana |
| क्रुद्ध | क्रोधित | angry |
| होइ | होकर | becoming |
| छाँड़ी | छोड़ी | hurled |
| सक्ति | शक्ति नामक भाला-जैसा अस्त्र | a spear-like weapon |
| प्रचंड | अत्यंत प्रबल | formidable |
2चली बिभीषन सन्मुख मनहुँ काल कर दंड॥ ९३॥
English explanation
The weapon sped toward Vibhishana, as though it were Death’s rod.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| चली | चली | sped |
| बिभीषन | विभीषण, रावण के भाई | Vibhishana, Ravana’s brother |
| सन्मुख | की ओर | toward |
| मनहुँ | मानो | as though |
| काल | काल, मृत्यु | Death |
| कर | का | of |
| दंड | दंड | rod |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- दोहा 93
- स्रोत अभिलेख
- 6.93
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 867
- सहायक विषय
- इन्द्रका श्रीरामजीके लिये रथ भेजना, राम-रावण-युद्ध
- मुद्रित पृष्ठ
- 866, 867
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।