लङ्काकाण्ड · दोहा 37 · दोहा/सोरठा
दुइ सुत मरे दहेउ पुर अजहुँ पूर पिय देहु।
दुइ सुत मरे दहेउ पुर अजहुँ पूर पिय देहु।
कृपासिंधु रघुनाथ भजि नाथ बिमल जसु लेहु।।37।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 6.37 · पुस्तक पृ. 808, 809
भावार्थ और शब्दार्थ
1दुइ सुत मरे दहेउ पुर अजहुँ पूर पिय देहु।
दो पुत्र मारे गए, नगर जल गया; प्रिय, अब भी [‘पूर देहु’ का आशय दिए हुए पाठ में अस्पष्ट है]।
English explanation
Two sons have died, and the city has burned; beloved, even now [the appeal expressed by ‘पूर देहु’ is unclear in the supplied text].
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| दुइ | दो | two |
| सुत | पुत्र | sons |
| मरे | मारे गए | died; were killed |
| दहेउ | जल गया | burned |
| पुर | नगर | the city |
| अजहुँ | अब भी | even now |
| पूर | समाप्ति; ‘पूर देहु’—अब विरोध समाप्त कीजिए, बस कीजिए। | An end; ‘पूर देहु’ means to put an end to the opposition, to desist. |
| पिय | हे प्रिय पति | O beloved husband |
| देहु | दो | give |
2 कृपासिंधु रघुनाथ भजि नाथ बिमल जसु लेहु।।37।।
हे स्वामी, कृपा के सागर रघुनाथ का भजन करके निर्मल यश प्राप्त करो।
English explanation
O lord, worship Rama, Lord of the Raghu lineage and ocean of compassion, and gain unsullied renown.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कृपासिंधु | कृपा के सागर | ocean of compassion |
| रघुनाथ | रघुवंश के स्वामी राम | Rama, Lord of the Raghu lineage |
| भजि | भजन करके | by worshipping |
| नाथ | हे स्वामी | O lord |
| बिमल | निर्मल; निष्कलंक | unsullied |
| जसु | यश | renown |
| लेहु | प्राप्त करो | gain |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 37
- स्रोत अभिलेख
- 6.37
- सहायक विषय
- रावणको पुन: मन्दोदरीका समझाना
- मुद्रित पृष्ठ
- 808, 809
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।