लङ्काकाण्ड · दोहा 31 (ख) · दोहा/सोरठा
जिन्ह के बल कर गर्ब तोहि अइसे मनुज अनेक।
जिन्ह के बल कर गर्ब तोहि अइसे मनुज अनेक।
खाहीं निसाचर दिवस निसि मूढ़ समुझु तजि टेक।।31(ख)।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 6.31 · पुस्तक पृ. 801, 801
भावार्थ और शब्दार्थ
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1 जिन्ह के बल कर गर्ब तोहि अइसे मनुज अनेक।
जिनके बल का तुझे गर्व है, ऐसे अनेक मनुष्य—
English explanation
Many humans like those whose strength you take pride in—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जिन्ह | जिनके | those whose |
| के | के | of |
| बल | बल | strength |
| कर | का | of |
| गर्ब | गर्व | pride |
| तोहि | तुझे | to you |
| अइसे | ऐसे | such |
| मनुज | मनुष्य | humans |
| अनेक | अनेक | many |
2 खाहीं निसाचर दिवस निसि मूढ़ समुझु तजि टेक।।31(ख)।।
राक्षस दिन-रात ऐसे अनेक मनुष्यों को खाते हैं। हे मूर्ख, अपनी हठ छोड़कर समझ ले।
English explanation
Demons eat many such humans day and night. Fool, abandon your obstinacy and understand.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| खाहीं | खाते हैं | eat |
| निसाचर | राक्षस | demons |
| दिवस | दिन | day |
| निसि | रात | night |
| मूढ़ | हे मूर्ख | O fool |
| समुझु | समझ ले | understand |
| तजि | छोड़कर | abandoning |
| टेक | हठ; अड़ा हुआ आग्रह | obstinacy; stubborn insistence |
| ख | पद्य-संदर्भ चिह्न (ख) | verse reference marker (ख) |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 31 (ख)
- स्रोत अभिलेख
- 6.31
- सहायक विषय
- अंगदजीका लंका जाना और रावणकी सभामें अंगद-रावण-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 801, 801
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