लङ्काकाण्ड · दोहा 31 (क) · दोहा/सोरठा
अगुन अमान जानि तेहि दीन्ह पिता बनबास।
अगुन अमान जानि तेहि दीन्ह पिता बनबास।
सो दुख अरु जुबती बिरह पुनि निसि दिन मम त्रास।।31(क)।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 6.31 · पुस्तक पृ. 801, 801
भावार्थ और शब्दार्थ
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1अगुन अमान जानि तेहि दीन्ह पिता बनबास।
उसे गुणहीन और सम्मानहीन जानकर उसके पिता ने उसे वनवास दिया।
English explanation
Considering him devoid of virtues and honor, his father sent him into forest exile.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अगुन | गुणहीन | devoid of virtues |
| अमान | सम्मानहीन | without honor |
| जानि | जानकर | considering |
| तेहि | उसे; राम को | him; Rama |
| दीन्ह | दिया | gave |
| पिता | पिता ने | his father |
| बनबास | वन में निर्वासन | forest exile |
2 सो दुख अरु जुबती बिरह पुनि निसि दिन मम त्रास।।31(क)।।
वह वनवास का दुःख, फिर युवती पत्नी का विरह, और उसके ऊपर रात-दिन मेरा भय उसे सताता है।
English explanation
He suffers that grief of exile, separation from his young wife, and, besides, fear of me night and day.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सो | वह | that |
| दुख | दुःख | grief |
| अरु | और | and |
| जुबती | युवती पत्नी; सीता | young wife; Sita |
| बिरह | वियोग | separation |
| पुनि | फिर; इसके अतिरिक्त | besides |
| निसि | रात | night |
| दिन | दिन | day |
| मम | मेरा; मुझसे होने वाला | of me |
| त्रास | भय | fear |
| क | पद्य-संदर्भ चिह्न (क) | verse reference marker (क) |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 31 (क)
- स्रोत अभिलेख
- 6.31
- सहायक विषय
- अंगदजीका लंका जाना और रावणकी सभामें अंगद-रावण-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 801, 801
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