लङ्काकाण्ड · दोहा 32 (क) · दोहा/सोरठा
तरकि पवनसुत कर गहे आनि धरे प्रभु पास।
तरकि पवनसुत कर गहे आनि धरे प्रभु पास।
कौतुक देखहिं भालु कपि दिनकर सरिस प्रकास।।32(क)।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 6.32 · पुस्तक पृ. 802, 803
भावार्थ और शब्दार्थ
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1तरकि पवनसुत कर गहे आनि धरे प्रभु पास।
हनुमान ने उछलकर मुकुटों को हाथों में पकड़ लिया और लाकर प्रभु राम के पास रख दिया।
English explanation
Hanuman sprang up, caught the crowns in his hands, and brought and placed them beside Lord Rama.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तरकि | उछलकर | springing up |
| पवनसुत | पवनपुत्र हनुमान ने | Hanuman, son of the wind god |
| कर | हाथों में | in his hands |
| गहे | पकड़ लिए | caught |
| आनि | लाकर | bringing |
| धरे | रख दिए | placed |
| प्रभु | प्रभु राम | Lord Rama |
| पास | के पास | beside |
2 कौतुक देखहिं भालु कपि दिनकर सरिस प्रकास।।32(क)।।
भालू और वानर इस अद्भुत दृश्य को देखते हैं; मुकुटों की चमक सूर्य के समान है।
English explanation
The bears and monkeys watch the marvel; the crowns shine like the sun.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कौतुक | अद्भुत दृश्य | the marvel |
| देखहिं | देखते हैं | watch |
| भालु | भालू | bears |
| कपि | वानर | monkeys |
| दिनकर | सूर्य | the sun |
| सरिस | के समान | like |
| प्रकास | चमक, प्रकाश | radiance |
| क | पद-संदर्भ का चिह्न ‘क’ | verse reference marker ‘क’ |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 32 (क)
- स्रोत अभिलेख
- 6.32
- सहायक विषय
- अंगदजीका लंका जाना और रावणकी सभामें अंगद-रावण-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 802, 803
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