लङ्काकाण्ड · दोहा 68 · दोहा/सोरठा
छन महुँ प्रभु के सायकन्हि काटे बिकट पिसाच।
छन महुँ प्रभु के सायकन्हि काटे बिकट पिसाच।
पुनि रघुबीर निषंग महुँ प्रबिसे सब नाराच।।68।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 6.68 · पुस्तक पृ. 837, 837
भावार्थ और शब्दार्थ
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1छन महुँ प्रभु के सायकन्हि काटे बिकट पिसाच।
एक क्षण में प्रभु के बाणों ने भयंकर राक्षसों को काट डाला।
English explanation
In a moment, the Lord's arrows cut down the fearsome demons.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| छन | क्षण | a moment |
| महुँ | में | within |
| प्रभु | प्रभु श्रीराम | the Lord Rama |
| के | के | belonging to |
| सायकन्हि | बाणों ने | the arrows |
| काटे | काट डाला | cut down |
| बिकट | भयंकर | fearsome |
| पिसाच | राक्षसों को | the demons |
2 पुनि रघुबीर निषंग महुँ प्रबिसे सब नाराच।।68।।
फिर सभी नाराच बाण श्रीराम के तरकश में प्रवेश कर गए।
English explanation
Then all the iron arrows entered Rama's quiver again.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| पुनि | फिर | then; again |
| रघुबीर | रघुकुल के वीर श्रीराम के | of Rama, hero of the Raghu lineage |
| निषंग | तरकश | quiver |
| महुँ | में | into |
| प्रबिसे | प्रवेश कर गए | entered |
| सब | सभी | all |
| नाराच | लोहे के नाराच बाण | iron arrows |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 68
- स्रोत अभिलेख
- 6.68
- सहायक विषय
- कुम्भकर्ण-युद्ध और उसकी परमगति
- मुद्रित पृष्ठ
- 837, 837
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