लङ्काकाण्ड · दोहा 104 · दोहा
अहह नाथ रघुनाथ सम कृपासिंधु नहिं आन।
अहह नाथ रघुनाथ सम कृपासिंधु नहिं आन।
जोगि बृंद दुर्लभ गति तोहि दीन्हि भगवान॥ १०४॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 6.104 · पुस्तक पृ. 881, 882
भावार्थ और शब्दार्थ
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1अहह नाथ रघुनाथ सम कृपासिंधु नहिं आन।
हाय नाथ! रघुनाथ के समान कृपा का सागर कोई दूसरा नहीं है।
English explanation
Alas, my lord! There is no other ocean of compassion like Rama, Lord of the Raghu line.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अहह | हाय! | alas! |
| नाथ | हे स्वामी; हे पति | my lord; my husband |
| रघुनाथ | रघुवंश के स्वामी राम | Rama, Lord of the Raghu line |
| सम | के समान | like; equal to |
| कृपासिंधु | कृपा के सागर | ocean of compassion |
| नहिं | नहीं है | there is no |
| आन | अन्य; दूसरा | other; another |
2जोगि बृंद दुर्लभ गति तोहि दीन्हि भगवान॥ १०४॥
भगवान ने तुम्हें वह परम गति दी जो योगियों के समूह के लिए भी दुर्लभ है।
English explanation
The Lord granted you that ultimate spiritual state which is difficult even for hosts of yogis to attain.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जोगि | योगियों के लिए | for yogis |
| बृंद | समूह | hosts; multitude |
| दुर्लभ | कठिनाई से प्राप्त होने वाली | difficult to attain |
| गति | परम अवस्था; मुक्ति | ultimate state; liberation |
| तोहि | तुम्हें | to you |
| दीन्हि | दी; प्रदान की | gave; granted |
| भगवान | भगवान राम ने | the Lord, Rama |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- दोहा 104
- स्रोत अभिलेख
- 6.104
- सहायक विषय
- मन्दोदरी-विलाप, रावणकी अन्त्येष्टि-क्रिया
- मुद्रित पृष्ठ
- 881, 882
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