लङ्काकाण्ड · दोहा 103 · दोहा
कृपादृष्टि करि बृष्टि प्रभु अभय किए सुर बृंद।
कृपादृष्टि करि बृष्टि प्रभु अभय किए सुर बृंद।
भालु कीस सब हरषे जय सुख धाम मुकुंद॥ १०३॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 6.103 · पुस्तक पृ. 879, 880
भावार्थ और शब्दार्थ
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1कृपादृष्टि करि बृष्टि प्रभु अभय किए सुर बृंद।
प्रभु ने अपनी कृपामयी दृष्टि की वर्षा करके देवताओं के समूह को निर्भय कर दिया।
English explanation
Showering his compassionate gaze, the Lord made the hosts of gods fearless.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कृपादृष्टि | करुणामयी दृष्टि की | of a compassionate gaze |
| करि | करके | having made |
| बृष्टि | वर्षा | a shower |
| प्रभु | प्रभु राम ने | Lord Rama |
| अभय | निर्भय | fearless |
| किए | कर दिया | made |
| सुर | देवताओं के | of gods |
| बृंद | समूह को | the hosts |
2भालु कीस सब हरषे जय सुख धाम मुकुंद॥ १०३॥
सभी भालू और वानर हर्षित हुए—सुख के धाम, मुक्ति देने वाले प्रभु की जय हो!
English explanation
All the bears and monkeys rejoiced: victory to the Lord, the abode of happiness and giver of liberation!
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| भालु | भालू | bears |
| कीस | वानर | monkeys |
| सब | सभी | all |
| हरषे | आनंदित हुए | rejoiced |
| जय | जय हो | victory to |
| सुख | सुख के | of happiness |
| धाम | धाम | the abode |
| मुकुंद | मुक्ति देने वाले प्रभु राम | Lord Rama, giver of liberation |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- दोहा 103
- स्रोत अभिलेख
- 6.103
- सहायक विषय
- राम-रावण-युद्ध, रावण-वध, सर्वत्र जयध्वनि
- मुद्रित पृष्ठ
- 879, 880
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