लङ्काकाण्ड · दोहा 102 · दोहा
खैंचि सरासन श्रवन लगि छाड़े सर एकतीस।
खैंचि सरासन श्रवन लगि छाड़े सर एकतीस।
रघुनायक सायक चले मानहुँ काल फनीस॥ १०२॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 6.102 · पुस्तक पृ. 878, 879
भावार्थ और शब्दार्थ
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1खैंचि सरासन श्रवन लगि छाड़े सर एकतीस।
धनुष को कान तक खींचकर राम ने इकतीस बाण छोड़े।
English explanation
Drawing the bow back to his ear, Rama released thirty-one arrows.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| खैंचि | खींचकर | having drawn back |
| सरासन | धनुष | the bow |
| श्रवन | कान | the ear |
| लगि | तक | up to |
| छाड़े | छोड़े | released |
| सर | बाण | arrows |
| एकतीस | इकतीस | thirty-one |
2रघुनायक सायक चले मानहुँ काल फनीस॥ १०२॥
रघुकुल के नायक राम के बाण ऐसे चले, मानो प्राणघातक सर्प हों।
English explanation
The arrows of Rama, leader of the Raghu lineage, sped forth like deadly serpents.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| रघुनायक | रघुकुल के नायक राम के | of Rama, leader of the Raghu lineage |
| सायक | बाण | arrows |
| चले | चले; वेग से बढ़े | sped forth |
| मानहुँ | मानो; जैसे | as though; like |
| काल | प्राणघातक; मृत्यु जैसे | deadly; death-like |
| फनीस | सर्पराज; भयंकर सर्प | serpent lords; mighty serpents |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- दोहा 102
- स्रोत अभिलेख
- 6.102
- सहायक विषय
- राम-रावण-युद्ध, रावण-वध, सर्वत्र जयध्वनि
- मुद्रित पृष्ठ
- 878, 879
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