लङ्काकाण्ड · चौपाई · चौपाई
सोइ बिचारि तव प्रकृति सुहाई। दसकंधर मैं कीन्हि ढिठाई।।
मूल पाठ
सोइ बिचारि तव प्रकृति सुहाई। दसकंधर मैं कीन्हि ढिठाई।।
देखेउँ आइ जो कछु कपि भाषा। तुम्हरें लाज न रोष न माखा।।
स्रोत अभिलेख 6.24 · पुस्तक पृ. 794, 796
भावार्थ
मूल पाठ के बादतुम्हारा वही सुन्दर स्वभाव विचारकर, हे दशग्रीव! मैंने कुछ धृष्टता की है। हनुमान्ने जो कुछ कहा था, उसे आकर मैंने प्रत्यक्ष देख लिया कि तुम्हें न लज्जा है, न क्रोध है और न चिढ़ है॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 795 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 सोइ बिचारि तव प्रकृति सुहाई। दसकंधर मैं कीन्हि ढिठाई।।
English explanation
Ten-headed Ravana, considering that pleasing disposition of yours, I have taken this liberty.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सोइ | उसी को | that very thing |
| बिचारि | विचारकर | considering |
| तव | तुम्हारा | your |
| प्रकृति | स्वभाव | disposition |
| सुहाई | सुहावना | pleasing |
| दसकंधर | हे दस सिर वाले रावण | O ten-headed Ravana |
| मैं | मैंने | I |
| कीन्हि | की है | have committed |
| ढिठाई | ढिठाई; धृष्टता | boldness; impudence |
2 देखेउँ आइ जो कछु कपि भाषा। तुम्हरें लाज न रोष न माखा।।
English explanation
On coming here I have seen what Hanuman described: you have neither shame, anger, nor indignation.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| देखेउँ | मैंने देखा | I have seen |
| आइ | आकर | having come |
| जो | जो | what |
| कछु | कुछ | whatever |
| कपि | वानर हनुमान ने | the monkey Hanuman |
| भाषा | कहा था | had said |
| तुम्हरें | तुममें | in you |
| लाज | लज्जा | shame |
| न | नहीं | no |
| रोष | क्रोध | anger |
| न | नहीं | no |
| माखा | खीझ; आक्रोश | indignation; resentment |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 6.24
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 795
- सहायक विषय
- अंगदजीका लंका जाना और रावणकी सभामें अंगद-रावण-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 794, 796
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