लङ्काकाण्ड · चौपाई · चौपाई
सकुल सदल प्रभु रावन मार् यो। पावन जस त्रिभुवन बिस्तार् यो।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दआपने कुल और सेनासहित रावणका वध किया, त्रिभुवनमें अपना पवित्र यश फैलाया और मुझ दीन, पापी, बुद्धिहीन और जातिहीनपर बहुत प्रकारसे कृपा की॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 896 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
सकुल सदल प्रभु रावन मार् यो। पावन जस त्रिभुवन बिस्तार् यो।।
दीन मलीन हीन मति जाती। मो पर कृपा कीन्हि बहु भाँती।।
स्रोत अभिलेख 6.116 · पुस्तक पृ. 896, 896
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 सकुल सदल प्रभु रावन मार् यो। पावन जस त्रिभुवन बिस्तार् यो।।
English explanation
Lord, you slew Ravana together with his clan and army, and spread your purifying fame throughout the three worlds.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सकुल | कुल सहित | together with his clan |
| सदल | सेना सहित | together with his army |
| प्रभु | हे प्रभु | O Lord |
| रावन | रावण को | Ravana |
| मार् | मारने की क्रिया का अंश | the verbal stem meaning ‘kill’ |
| यो | भूतकाल का क्रिया-अंत | past-tense verb ending |
| पावन | पवित्र करने वाला | purifying |
| जस | यश | fame |
| त्रिभुवन | तीनों लोकों में | throughout the three worlds |
| बिस्तार् | फैलाने की क्रिया का अंश | the verbal stem meaning ‘spread’ |
| यो | भूतकाल का क्रिया-अंत | past-tense verb ending |
2 दीन मलीन हीन मति जाती। मो पर कृपा कीन्हि बहु भाँती।।
English explanation
Though I am lowly, impure, and deficient in understanding and birth, you have shown me grace in many ways.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| दीन | दीन, असहाय | lowly and helpless |
| मलीन | मलिन, अशुद्ध | impure |
| हीन | हीन | deficient or low |
| मति | बुद्धि में | in understanding |
| जाती | जाति या जन्म में | in lineage or birth |
| मो | मुझ | me |
| पर | पर | upon |
| कृपा | कृपा | grace |
| कीन्हि | की | bestowed |
| बहु | अनेक | many |
| भाँती | प्रकार से | in ways |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 6.116
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 896
- सहायक विषय
- विभीषणकी प्रार्थना, श्रीरामजीके द्वारा भरतजीके प्रेमदशाका वर्णन, शीघ्र अयोध्या पहुँचनेका अनुरोध
- मुद्रित पृष्ठ
- 896, 896
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।