लङ्काकाण्ड · चौपाई · चौपाई
निसिहि ससिहि निंदति बहु भाँती। जुग सम भई सिराति न राती।।
मूल पाठ
निसिहि ससिहि निंदति बहु भाँती। जुग सम भई सिराति न राती।।
करति बिलाप मनहिं मन भारी। राम बिरहँ जानकी दुखारी।।
स्रोत अभिलेख 6.1 · पुस्तक पृ. 875, 876
भावार्थ
मूल पाठ के बादवे रात्रिकी और चन्द्रमाकी बहुत प्रकारसे निन्दा कर रही हैं [और कह रही हैं—] रात युगके समान बड़ी हो गयी, वह बीतती ही नहीं। जानकीजी श्रीरामजीके विरहमें दु:खी होकर मन-ही-मन भारी विलाप कर रही हैं॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 875 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 निसिहि ससिहि निंदति बहु भाँती। जुग सम भई सिराति न राती।।
English explanation
Sita reproaches the night and the moon in many ways. The night seems as long as an age and will not end.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| निसिहि | रात को | the night |
| ससिहि | चंद्रमा को | the moon |
| निंदति | कोसती हैं | reproaches |
| बहु | अनेक | many |
| भाँती | प्रकारों से | in ways |
| जुग | युग | an age |
| सम | के समान | as long as |
| भई | हो गई | became |
| सिराति | बीतती; समाप्त होती | passes; ends |
| न | नहीं | not |
| राती | रात | the night |
2 करति बिलाप मनहिं मन भारी। राम बिरहँ जानकी दुखारी।।
English explanation
Janaki, sorrowful in separation from Rama, laments deeply within herself.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| करति | करती हैं | does |
| बिलाप | विलाप | lamentation |
| मनहिं | मन में ही | within her mind |
| मन | मन; भीतर ही | inwardly |
| भारी | गहरा; बहुत | deep; intense |
| राम | श्रीराम से | from Rama |
| बिरहँ | वियोग के कारण | because of separation |
| जानकी | जनक की पुत्री सीता | Sita, daughter of Janaka |
| दुखारी | दुखी | sorrowful |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 6.1
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 875
- सहायक विषय
- त्रिजटा-सीता-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 875, 876
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