लङ्काकाण्ड · चौपाई · चौपाई
तब रघुपति अनुसासन पाई। मातलि चलेउ चरन सिरु नाई।।
मूल पाठ
तब रघुपति अनुसासन पाई। मातलि चलेउ चरन सिरु नाई।।
आए देव सदा स्वारथी। बचन कहहिं जनु परमारथी।।
स्रोत अभिलेख 6.11 · पुस्तक पृ. 888, 889
भावार्थ
मूल पाठ के बादतब श्रीरघुनाथजीकी आज्ञा पाकर इन्द्रका सारथि मातलि चरणोंमें सिर नवाकर [रथ लेकर] चला गया। तदनन्तर सदाके स्वार्थी देवता आये। वे ऐसे वचन कह रहे हैं मानो बड़े परमार्थी हों॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 888 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 तब रघुपति अनुसासन पाई। मातलि चलेउ चरन सिरु नाई।।
English explanation
Then, receiving Rama’s command, Matali bowed his head at his feet and departed.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तब | तब | then |
| रघुपति | रघुवंश के स्वामी राम की | of Rama, lord of the Raghu lineage |
| अनुसासन | आज्ञा | command |
| पाई | पाकर | having received |
| मातलि | इंद्र के सारथी मातलि | Matali, Indra’s charioteer |
| चलेउ | चला गया | departed |
| चरन | चरणों में | at his feet |
| सिरु | सिर | head |
| नाई | झुकाकर | having bowed |
2 आए देव सदा स्वारथी। बचन कहहिं जनु परमारथी।।
English explanation
The gods, always intent on their own interests, arrived and spoke as though devoted to higher, selfless purposes.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| आए | आए | arrived |
| देव | देवता | the gods |
| सदा | सदैव | always |
| स्वारथी | अपने हित में लगे हुए | self-interested |
| बचन | वचन | words |
| कहहिं | कहते हैं | say |
| जनु | मानो | as though |
| परमारथी | निःस्वार्थ परम हित में लगे हुए | devoted to higher, selfless purposes |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 6.11
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 888
- सहायक विषय
- देवताओंकी स्तुति, इन्द्रकी अमृत-वर्षा
- मुद्रित पृष्ठ
- 888, 889
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।