किष्किन्धाकाण्ड · दोहा 10 · दोहा
राम चरन दृढ़ प्रीति करि बालि कीन्ह तनु त्याग।
राम चरन दृढ़ प्रीति करि बालि कीन्ह तनु त्याग।
सुमन माल जिमि कंठ ते गिरत न जानइ नाग॥ १०॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 4.1 · पुस्तक पृ. 692, 692
भावार्थ और शब्दार्थ
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1राम चरन दृढ़ प्रीति करि बालि कीन्ह तनु त्याग।
राम के चरणों में दृढ़ प्रेम रखकर बालि ने शरीर त्याग दिया।
English explanation
With steadfast love for Rama’s feet, Bali relinquished his body.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| राम | प्रभु राम के | of Lord Rama |
| चरन | चरणों में | toward the feet |
| दृढ़ | अटल | steadfast |
| प्रीति | प्रेम | love |
| करि | करके; रखकर | having established |
| बालि | बालि ने | Bali |
| कीन्ह | किया | performed |
| तनु | शरीर का | of the body |
| त्याग | त्याग | relinquishment |
2सुमन माल जिमि कंठ ते गिरत न जानइ नाग॥ १०॥
जैसे हाथी अपने गले से फूलों की माला गिरने का पता नहीं पाता, वैसे ही बालि ने शरीर त्याग दिया।
English explanation
Just as an elephant does not notice a flower garland falling from its neck, Bali relinquished his body.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सुमन | फूलों की | of flowers |
| माल | माला | garland |
| जिमि | जैसे | just as |
| कंठ | गले | the neck |
| ते | से | from |
| गिरत | गिरती हुई | falling |
| न | नहीं | not |
| जानइ | जानता; ध्यान देता | notices |
| नाग | हाथी | an elephant |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- किष्किन्धाकाण्ड
- पद
- दोहा 10
- स्रोत अभिलेख
- 4.1
- सहायक विषय
- बालि-सुग्रीव-युद्ध, बालि-उद्धार
- मुद्रित पृष्ठ
- 692, 692
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।