किष्किन्धाकाण्ड · दोहा 28 · दोहा/सोरठा
मैं देखउँ तुम्ह नाहि गीघहि दष्टि अपार।।
मैं देखउँ तुम्ह नाहि गीघहि दष्टि अपार।।
बूढ भयउँ न त करतेउँ कछुक सहाय तुम्हार।।28।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 4.28 · पुस्तक पृ. 708, 709
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1मैं देखउँ तुम्ह नाहि गीघहि दष्टि अपार।।
मैं उन्हें देख सकता हूँ, तुम नहीं; गिद्ध की दृष्टि बहुत दूर तक जाती है।
English explanation
I can see her, but you cannot; a vulture's sight reaches very far.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मैं | मैं, संपाति | I, Sampati |
| देखउँ | देखता हूँ | see |
| तुम्ह | तुम वानर | you monkeys |
| नाहि | नहीं देख सकते | cannot see |
| गीघहि | गिद्ध की | a vulture's |
| दष्टि | दृष्टि | sight |
| अपार | अत्यंत दूर तक पहुँचने वाली | far-reaching |
2 बूढ भयउँ न त करतेउँ कछुक सहाय तुम्हार।।28।।
मैं बूढ़ा हो गया हूँ; नहीं तो तुम्हारी कुछ सहायता करता।
English explanation
I have grown old; otherwise, I would have given you some help.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बूढ | बूढ़ा | old |
| भयउँ | हो गया हूँ | I have become |
| न | नहीं | not |
| त | तो | then |
| करतेउँ | मैं करता | I would have given |
| कछुक | कुछ | some |
| सहाय | सहायता | help |
| तुम्हार | तुम्हारी | to you |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- किष्किन्धाकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 28
- स्रोत अभिलेख
- 4.28
- सहायक विषय
- वानरोंका समुद्रतटपर आना, सम्पातीसे भेंट और बातचीत
- मुद्रित पृष्ठ
- 708, 709
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।