किष्किन्धाकाण्ड · दोहा 30 (क) · दोहा/सोरठा
भव भेषज रघुनाथ जसु सुनहि जे नर अरु नारि।
भव भेषज रघुनाथ जसु सुनहि जे नर अरु नारि।
तिन्ह कर सकल मनोरथ सिद्ध करिहि त्रिसिरारि।।30(क)।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 4.3 · पुस्तक पृ. 710, 711
भावार्थ और शब्दार्थ
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1भव भेषज रघुनाथ जसु सुनहि जे नर अरु नारि।
जो पुरुष और स्त्रियाँ संसार-बंधन की औषधि रूप रघुनाथ का यश सुनते हैं—
English explanation
Those men and women who hear Rama’s glory, a remedy for worldly bondage—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| भव | संसार-बंधन; जन्म-मरण | worldly bondage; repeated birth and death |
| भेषज | औषधि | remedy |
| रघुनाथ | रघुवंश के स्वामी राम | Rama, lord of Raghu’s lineage |
| जसु | यश | glory |
| सुनहि | सुनते हैं | hear |
| जे | जो | who |
| नर | पुरुष | men |
| अरु | और | and |
| नारि | स्त्रियाँ | women |
2 तिन्ह कर सकल मनोरथ सिद्ध करिहि त्रिसिरारि।।30(क)।।
त्रिशिरा के शत्रु राम उनके सभी मनोरथ सिद्ध करेंगे।
English explanation
Rama, the foe of Trishira, will fulfill all their aspirations.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तिन्ह | उनके | their |
| कर | का; संबंधसूचक | of; possessive marker |
| सकल | सभी | all |
| मनोरथ | मन की इच्छाएँ | aspirations |
| सिद्ध | पूर्ण | fulfilled |
| करिहि | करेंगे | will make |
| त्रिसिरारि | त्रिशिरा के शत्रु राम | Rama, enemy of the demon Trishira |
| क | पद-संदर्भ का चिह्न ‘क’ | verse-reference marker ‘क’ |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- किष्किन्धाकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 30 (क)
- स्रोत अभिलेख
- 4.3
- सहायक विषय
- समुद्र लाँघनेका परामर्श, जाम्बवन्तका हनुमान्जीको बल याद दिलाकर उत्साहित करना · श्रीरामगुणका माहात्म्य
- मुद्रित पृष्ठ
- 710, 711
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