किष्किन्धाकाण्ड · दोहा 26 · दोहा/सोरठा
निज इच्छा प्रभु अवतरइ सुर महि गो द्विज लागि।
निज इच्छा प्रभु अवतरइ सुर महि गो द्विज लागि।
सगुन उपासक संग तहँ रहहिं मोच्छ सब त्यागि।।26।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 4.26 · पुस्तक पृ. 706, 707
भावार्थ और शब्दार्थ
1निज इच्छा प्रभु अवतरइ सुर महि गो द्विज लागि।
प्रभु अपनी इच्छा से देवताओं, पृथ्वी, गायों और ब्राह्मणों के लिए अवतार लेते हैं।
English explanation
By his own will, the Lord incarnates for the sake of the gods, the earth, cows, and Brahmins.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| निज | अपनी | his own |
| इच्छा | इच्छा से | by will |
| प्रभु | प्रभु | the Lord |
| अवतरइ | अवतार लेते हैं | incarnates |
| सुर | देवताओं | gods |
| महि | पृथ्वी | the earth |
| गो | गायों | cows |
| द्विज | ब्राह्मणों | Brahmins |
| लागि | के लिए | for the sake of |
2 सगुन उपासक संग तहँ रहहिं मोच्छ सब त्यागि।।26।।
सगुण रूप के उपासक सब प्रकार की मुक्ति त्यागकर वहाँ उनके साथ रहते हैं।
English explanation
Worshippers of his manifest form remain there with him, renouncing all forms of liberation.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सगुन | गुणों सहित प्रकट रूप के | of the form manifest with attributes |
| उपासक | उपासक; भक्त | worshippers; devotees |
| संग | प्रभु के साथ | with the Lord |
| तहँ | वहाँ | there |
| रहहिं | रहते हैं | remain |
| मोच्छ | मोक्ष; मुक्ति | liberation |
| सब | सब प्रकार की | all forms of |
| त्यागि | त्यागकर | having renounced |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- किष्किन्धाकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 26
- स्रोत अभिलेख
- 4.26
- सहायक विषय
- वानरोंका समुद्रतटपर आना, सम्पातीसे भेंट और बातचीत
- मुद्रित पृष्ठ
- 706, 707
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।