किष्किन्धाकाण्ड · चौपाई · चौपाई
सो पुनि गई जहाँ रघुनाथा। जाइ कमल पद नाएसि माथा।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दऔर वह स्वयं वहाँ गयी जहाँ श्रीरघुनाथजी थे। उसने जाकर प्रभुके चरणकमलोंमें मस्तक नवाया और बहुत प्रकारसे विनती की। प्रभुने उसे अपनी अनपायिनी (अचल) भक्ति दी॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 706 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
सो पुनि गई जहाँ रघुनाथा। जाइ कमल पद नाएसि माथा।।
नाना भाँति बिनय तेहिं कीन्ही। अनपायनी भगति प्रभु दीन्ही।।
स्रोत अभिलेख 4.25 · पुस्तक पृ. 705, 706
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 सो पुनि गई जहाँ रघुनाथा। जाइ कमल पद नाएसि माथा।।
English explanation
Then Svayamprabha went where Rama was and bowed her head at his lotus-like feet.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सो | वह, स्वयंप्रभा | she, Svayamprabha |
| पुनि | फिर | then |
| गई | गईं | went |
| जहाँ | जहाँ | where |
| रघुनाथा | रघुकुल के स्वामी राम | Rama, lord of Raghu’s lineage |
| जाइ | जाकर | having gone there |
| कमल | कमल-समान | lotus-like |
| पद | चरणों पर | at his feet |
| नाएसि | उन्होंने झुकाया | she bowed |
| माथा | सिर | her head |
2 नाना भाँति बिनय तेहिं कीन्ही। अनपायनी भगति प्रभु दीन्ही।।
English explanation
Svayamprabha offered supplications in many ways; Lord Rama granted her unfailing devotion.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| नाना | अनेक | many |
| भाँति | प्रकार से | in ways |
| बिनय | विनती | supplication |
| तेहिं | उन्होंने, स्वयंप्रभा ने | she, Svayamprabha |
| कीन्ही | की | made |
| अनपायनी | कभी न मिटने वाली | unfailing; never lost |
| भगति | भक्ति | devotion |
| प्रभु | प्रभु राम ने | Lord Rama |
| दीन्ही | दी | granted |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- किष्किन्धाकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 4.25
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 706
- सहायक विषय
- वानरोंका समुद्रतटपर आना, सम्पातीसे भेंट और बातचीत
- मुद्रित पृष्ठ
- 705, 706
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।