किष्किन्धाकाण्ड · चौपाई · चौपाई
बिनु धन निर्मल सोह अकासा। हरिजन इव परिहरि सब आसा।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दबिना बादलोंका निर्मल आकाश ऐसा शोभित हो रहा है जैसे भगवद्भक्त सब आशाओंको छोड़कर सुशोभित होते हैं। कहीं-कहीं (विरले ही स्थानोंमें) शरद्-ऋतुकी थोड़ी-थोड़ी वर्षा हो रही है। जैसे कोई विरले ही मेरी भक्ति पाते हैं॥ ५॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 698 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
बिनु धन निर्मल सोह अकासा। हरिजन इव परिहरि सब आसा।।
कहुँ कहुँ बृष्टि सारदी थोरी। कोउ एक पाव भगति जिमि मोरी।।
स्रोत अभिलेख 4.16 · पुस्तक पृ. 697, 698
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 बिनु धन निर्मल सोह अकासा। हरिजन इव परिहरि सब आसा।।
English explanation
Allowing for a likely textual error: the cloudless, clear sky shines beautifully, like a devotee of God who has relinquished all desires.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बिनु | बिना | without |
| धन | बादल—संभावित अभिप्राय | clouds—probable intended meaning |
| निर्मल | निर्मल | clear |
| सोह | शोभित है | shines beautifully |
| अकासा | आकाश | sky |
| हरिजन | भगवान का भक्त | a devotee of God |
| इव | जैसे | like |
| परिहरि | छोड़कर | having relinquished |
| सब | सभी | all |
| आसा | आशाएँ और इच्छाएँ | hopes and desires |
2 कहुँ कहुँ बृष्टि सारदी थोरी। कोउ एक पाव भगति जिमि मोरी।।
English explanation
Here and there a little autumn rain falls, just as only a rare person attains devotion to me.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कहुँ | कहीं | here |
| कहुँ | कहीं | and there |
| बृष्टि | वर्षा | rain |
| सारदी | शरद ऋतु की | of autumn |
| थोरी | थोड़ी | a little |
| कोउ | कोई | someone |
| एक | विरला एक | a rare one |
| पाव | पाता है | attains |
| भगति | भक्ति | devotion |
| जिमि | जैसे | just as |
| मोरी | मेरी; मुझ राम के प्रति | to me, Rama |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- किष्किन्धाकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 4.16
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 698
- सहायक विषय
- शरद्-ऋतु-वर्णन
- मुद्रित पृष्ठ
- 697, 698
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।