किष्किन्धाकाण्ड · चौपाई · चौपाई
पुनि धीरजु धरि अस्तुति कीन्ही। हरष हृदयँ निज नाथहि चीन्ही।।
मूल पाठ
पुनि धीरजु धरि अस्तुति कीन्ही। हरष हृदयँ निज नाथहि चीन्ही।।
मोर न्याउ मैं पूछा साईं। तुम्ह पूछहु कस नर की नाईं।।
स्रोत अभिलेख 4.2 · पुस्तक पृ. 683, 684
भावार्थ
मूल पाठ के बादफिर धीरज धरकर स्तुति की। अपने नाथको पहचान लेनेसे हृदयमें हर्ष हो रहा है। [फिर हनुमान्जीने कहा—] हे स्वामी! मैंने जो पूछा वह मेरा पूछना तो न्याय था, [वर्षोंके बाद आपको देखा, वह भी तपस्वीके वेषमें और मेरी वानरी-बुद्धि, इससे मैं तो आपको पहचान न सका और अपनी परिस्थितिके अनुसार मैंने आपसे पूछा] परन्तु आप मनुष्यकी तरह कैसे पूछ रहे हैं?॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 683 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 पुनि धीरजु धरि अस्तुति कीन्ही। हरष हृदयँ निज नाथहि चीन्ही।।
English explanation
Then, regaining composure, Hanuman offered praise. Recognizing his own Lord, he rejoiced in his heart.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| पुनि | फिर | then |
| धीरजु | धैर्य | composure |
| धरि | धारण करके | regaining |
| अस्तुति | स्तुति | praise |
| कीन्ही | की | offered |
| हरष | आनंद | joy |
| हृदयँ | हृदय में | in the heart |
| निज | अपने | his own |
| नाथहि | स्वामी को | Lord |
| चीन्ही | पहचानकर | having recognized |
2 मोर न्याउ मैं पूछा साईं। तुम्ह पूछहु कस नर की नाईं।।
English explanation
Master, it was reasonable for me to ask; but why do you ask like an ordinary human?
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मोर | मेरे लिए | for me |
| न्याउ | उचित था | was reasonable |
| मैं | मैंने | I |
| पूछा | पूछा | asked |
| साईं | हे स्वामी | O Master |
| तुम्ह | आप | you |
| पूछहु | पूछते हैं | ask |
| कस | क्यों | why |
| नर | मनुष्य | a human |
| की | की | of |
| नाईं | तरह | in the manner |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- किष्किन्धाकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 4.2
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 683
- सहायक विषय
- श्रीरामजीसे हनुमान्जीका मिलना और श्रीराम-सुग्रीवकी मित्रता
- मुद्रित पृष्ठ
- 683, 684
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।