किष्किन्धाकाण्ड · चौपाई · चौपाई
देत लेत मन संक न धरई। बल अनुमान सदा हित करई।।
मूल पाठ
देत लेत मन संक न धरई। बल अनुमान सदा हित करई।।
बिपति काल कर सतगुन नेहा। श्रुति कह संत मित्र गुन एहा।।
स्रोत अभिलेख 4.7 · पुस्तक पृ. 687, 690
भावार्थ
मूल पाठ के बाददेने-लेनेमें मनमें शंका न रखे। अपने बलके अनुसार सदा हित ही करता रहे। विपत्तिके समयमें तो सदा सौगुना स्नेह करे। वेद कहते हैं कि संत (श्रेष्ठ) मित्रके गुण (लक्षण) ये हैं॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 688 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 देत लेत मन संक न धरई। बल अनुमान सदा हित करई।।
English explanation
One should harbor no suspicion in giving and receiving, and always benefit one's friend according to one's means.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| देत | देते समय | when giving |
| लेत | लेते समय | when receiving |
| मन | मन में | in the mind |
| संक | संदेह | suspicion |
| न | नहीं | not |
| धरई | रखे | harbors |
| बल | सामर्थ्य | one's means |
| अनुमान | के अनुसार | according to |
| सदा | सदा | always |
| हित | भलाई | benefit |
| करई | करे | does |
2 बिपति काल कर सतगुन नेहा। श्रुति कह संत मित्र गुन एहा।।
English explanation
In adversity, one shows a hundredfold affection; the Vedas describe these as the qualities of a saintly friend.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बिपति | विपत्ति | adversity |
| काल | के समय | at the time of |
| कर | करे | shows |
| सतगुन | सौगुना | a hundredfold |
| नेहा | स्नेह | affection |
| श्रुति | वेद | the Vedas |
| कह | कहते हैं | declare |
| संत | सज्जन | saintly |
| मित्र | मित्र के | friend's |
| गुन | गुण | qualities |
| एहा | ये | these |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- किष्किन्धाकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 4.7
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 688
- सहायक विषय
- सुग्रीवका दु:ख सुनाना, बालिवधकी प्रतिज्ञा, श्रीरामजीका मित्र-लक्षण-वर्णन · सुग्रीवका वैराग्य
- मुद्रित पृष्ठ
- 687, 690
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।